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सेहत की बातें

उ.प्र. के इस स्वास्थ्य केंद्र में बिना पैसे दिए ‘चूरन’ तक नहीं मिलता
'फेल हो रहा है मोदी और योगी का स्वच्छ और स्वस्थ भारत मिशन'

अनुज कुमार सिंह, रानीगंज, प्रतापगढ़ के साथ

दिल्ली से थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़ टीम

13 सितंबर 2017

उ.प्र. के जिला प्रतापगढ़ के अंतर्गत आने वाले रानीगंज तहसील में स्थिति प्राथमिक स्वास्थ केंद्र सिपाह महेरी प्रतापगढ़ में चिकित्सकों की मनमानी और लापरवाही से स्थानीय लोगों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह स्वास्थ्य केंद्र सुखपाल नगर, विधानसभा एवं तहसील रानीगंज, ब्लॉक सदर, जिला प्रतापगढ़ के तहत आता है। स्थानीय लोगों ने प्राथमिक स्वास्थ केंद्र सिपाह महेरी के प्रमुख डॉक्टर मकसूद खान पर आरोप लगाते हुए ‘थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़’ को बताया कि अस्पताल के डॉक्टर खान अस्पताल से अक्सर नदारत रहते हैं। कंपाउंडर सुरेंद्र सिंह बिना पैसा लिए किसी को एक गोली और चूरन तक नहीं देता। वार्ड ब्वॉय अनिल सिंह ही कभी कभार लोगों को दवा दे देता है।


ऐसा कैसे बनेगा स्वच्छ और स्वस्थ भारत।

इससे बुरा हाल और क्या हो सकता है योगी सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था की। 10 से 12 गावों के बीच में 20 साल पुराने बने इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि यहां दी जाने वाली दवाइयां अक्सर एक्सपायरी निकल जाती हैं। अस्पताल परिसर में चारों तरफ गंदगी और घास-फूंस की भरमार है। मरीजों को इस प्राथमिक स्वास्थ केंद्र की दहलीज पर भी आने में डर लगता है। दूरदराज से आने वाले मरीजों को डॉक्टर महोदय का घंटों इंतजार करने के बाद बिना उपचार कराए वापस जाना पड़ता है। यही नहीं जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी यानि सीएमओ से इस बारे में कई बार शिकायत की गयी लेकिन सीएमओ के कान में जूं तक नहीं रेंगी। कुछ दिन पहले डिप्टी सीएमओ यानि उप मुख्य चिकित्साधिकारी, प्रतापगढ़ इस केंद्र पर आए और लोगों से कहा कि स्थितियां ठीक हो जाएंगी लेकिन मामला ढ़ाक का तीन पात ही निकला। दूसरे दिन इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों की भीड़ तो दिखी, लेकिन न डॉक्टर दिखे न कंपाउंड दिखे। कहने को यहां प्रसूति घर है लेकिन यहां किसी तरह की बुनियादी सुविधाओं का नामोंनिशां नहीं दिख रहा है। अस्पताल परिसर का अंदर और बाहर का हाल चारों तरफ अस्त व्यस्त है। कुछ भी व्यवस्थित नहीं है। जिसके जिम्मेवार यहां के प्रभारी डाक्टर खान और कंपाउंडर अनिल सिंह है।



अस्पताल और बैठे मरीज अक्सर डॉक्टर साहब की राह देखकर निराश लौट जाते हैं।

केंद्र की मोदी और राज्य की योगी सरकार द्वारा स्वच्छ और स्वस्थ भारत की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। योगी सरकार का यह कहना कि सरकार समाज के निचले तपके के लिए काम कर रही है, इस अस्पताल को देखकर लगता है कि योगी सरकार की ये बातें महज एक जुमला ही साबित हो रही है। हकीकत यह है कि आजादी के बाद से आज तक चाहे मोदी हों या योगी, शासन के कार्य प्रणाली में न तो कोई बदलाव आया है न तो शासन के कर्मचारियों में किसी तरह का सरकार का भय दिख रहा है। जनता के सामने अच्छे सपनों का जो खीर परोसा जाता है वह महज एक छलावा के अलावां और कुछ नहीं दिखता। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो कहने की बड़े-बड़े वादे कर रही है लेकिन प्रदेश में स्वास्थ सेवाओं में अभी तक सुधार नाम की चीज नहीं दिख रही है। 


अस्पताल परिसर में घास-फूंस गंदगी की भरमार है।

बता दें कि प्रदेश की कुल आबादी के 50 फीसदी लोग हर साल केवल सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जाते हैं। इस आंकड़े से अवगत होने के बावजूद मरीजों के लिए जरूरी संसाधनों को जुटाने में सरकार मीलों पीछे है। प्रदेश में करीब 200 बड़े सरकारी अस्पताल हैं। मगर गंभीर बीमारियों के इलाज की बात की जाए तो यूपी में ऐसे सरकारी अस्तपालों की संख्या एक दर्जन से अधिक नहीं है।

हजारों की संख्या में गांवों के आसपास स्वास्थ्य केंद्रों में सामान्य बीमारियों का इलाज करने में भी चिकित्सक हाथ खड़े कर देते हैं। जिसका जीता जागता उदाहरण यह स्वास्थ्य केंद्र भी है। प्रदेश में चिकित्सकों के सात हजार से अधिक पद खाली हैं। योगी सरकार ने केंद्र सरकार के सामने गुहार लगाई है कि, उनको अधिक संसाधन उपलब्ध करवाए जाएं। ई हास्पिटल सेवा के तहत प्रदेश के 100 अस्पतालों को विकसित करने की तैयारी की जा रही है। देखना है कि कितना यह व्यवहारिक में उतर पाती है।


प्रदेश की 22 करोड़ हैं आबादी में 11 करोड़ लोग हर साल सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जाते हैं। लखनऊ के ट्रामा सेंटर जहां पूरे प्रदेश से गंभीर मरीजों को इलाज के लिए लाया जाता है, वहां रुई, पट्टी, बेटाडिन और थर्मामीटर ही वेलफेयर मेडिकल स्टोर से मिलते हैं। बाकी सभी महंगी दवाएं बाहर के मेडिकल स्टोर से ही मरीजों को खरीदने पड़ते हैं। इससे बुरा हाल और क्या हो सकता है प्रदेश और देश की स्वास्थ व्यवस्थाओं का।


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