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जब ईरान में बहाई धर्म अपनाने वाली 10 महिलाओं को फांसी की सजा दे दी गयी

आकाश श्रीवास्तव

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़ नेटवर्क

नई दिल्ली, 21 मई 2023

18 जून 2023 को इस्लामी गणराज्य ईरान में शीराज के एक स्क्वैयर में एक ही रात में 10 बहाई महिलाओं को फांसी दिये जाने के दर्दनाक हादसे के 40 वर्ष पूरे हो जायेंगे। उनका अपराध था एक ऐसे धर्म में अपनी आस्था छोड़ देने से इन्कार करना जो स्त्री पुरूष-समानता, जो ईरान में अपराध था, तथा एकता, न्याय और सच्चाई के सिद्धांतों को बढ़ावा देता है। इन महिलाओं को एक के बाद एक फांसी दी गयी, हर एक को बाध्य किया गया कि वह अगली महिला की दर्दनाक मौत को अपनी आंखो से देखे और अपनी आस्था से जुड़े रहने का खौफनाक नतीजा भुगते। उनमें से एक की उम्र मात्र 17 वर्ष थी, और अधिकांश बीसवें वर्ष के दशक में थीं। ईरान सरकार की इस बर्बर कार्रवाई पर देश विदेश के नागरिक और मानवाधिकार समूह स्तब्ध रह गये और भीषण आक्रोश व्यक्त किया गया। 
उस समय के विश्व नेताओं ने सजायाफ्ता बहाई महिलाओं और पुरूषों की रिहाई के लिये अपील की और अभियान चलाया लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। 

अंतर्राष्ट्रीय बहाई समुदाय उन बलिदानी महिलाओं तथा ईरान में स्त्री- पुरूष समानता के लिये सभी धर्मों और वर्गों की महिलाओं के लंबे समय से जारी संघर्ष के सम्मान में अब #OurStoryIsOne नाम से वैश्विक अभियान शुरू कर रहा है। दशकों से चल रहा यह संघर्ष आज भी जारी है। जेनेवा में संयुक्तराष्ट्र में अंतर्राष्ट्रीय बहाई समुदाय की प्रतिनिधि सिमिन फहंदेज का कहना है “ दस महिलाओं की यह करुण कथा समाप्त नहीं हुई है। समानता के लिये ईरानी महिलाओं के धैर्य और बलिदान की लंबी गाथा का यह एक अध्याय था।“....“आज ईरान में हज़ारों युवा लड़कियों के रक्त, आंसू और घाव समानता की मांग कर रहे हैं, हम उन दस महिलाओं के साथ हुए अन्याय की गूंज सुन सकते हैं...महसूस कर सकते हैं जिनकी दर्दनाक मौत ने अनेक जिंदगियों पर असर डाला।  हम न्याय और समानता के सिद्धांतों के लिये उठ खड़े होने का वही हौसला...वही जज़्बा देखते हैं। दुर्व्यवहार और जेल की यातनाओं के बावजूद आज की महिलायें भी, अपनी अग्रजों की तरह बहादुरी से न्यायपूर्ण और समृद्ध ईरान के लिये संघर्ष कर रही हैं।“  
मौत के घाट उतारी गयीं महिलाओं में से कुछ को तो बच्चों – बालक और बालिका दोनों को – नैतिक शिक्षा देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 19वीं शताब्दी से ही ईरान के बहाईयों ने लड़कियों के लिये स्कूल की स्थापना सहित, प्रत्येक स्तर पर प्रयासों से स्त्री-पुरूष समानता को बढ़ावा दिया है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद, स्त्री पुरूष समानता के प्रयासों के लिये विशेष रूप से बहाईयों को निशाना बनाया गया। समानता के इन प्रयासों का उद्देश्य था महिलाओं को सामुदायिक जीवन के हर क्षेत्र में भाग लेने और उन सभी आयोजनों में शामिल होने की अनुमति दिलाना जहां पुरूष भाग लेते हैं। सुश्री फहंदेज ने आगे कहा -“ ईरान के बहाई समुदाय ने हमेशा निर्णय प्रक्रिया सहित सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की पूर्ण भागीदारी की मांग की है और इसके लिये भारी कीमत चुकायी है।“.....“ 40 से अधिक वर्षों से जारी प्रणालीबद्ध उत्पीड़न, जो अब सभी ईरानियों तक फैल गया है, को बर्दाश्त करते हुए बहाई समुदाय ने अपनी जान की परवाह किये बिना स्त्री पुरूष समानता, न्याय और शिक्षा तक पंहुच को बढ़ावा देकर ईरान की सेवा के अपने अधिकार पर जोर दिया है जिसे वह एक पावन भूमि मानता है।“

दस महिलाओं को फांसी के फंदे पर चढ़ाये जाने और उसके बाद के चार दशकों में सैंकड़ों बहाई महिलाओं को बहाई होने और महिला होने के लिये उत्पीड़न और यातनाओं का सामना करना पड़ा।  सहनी पड़ी। इस्लामी क्रांति के बाद, देश के प्रमुख सामाजिक पदों पर काम कर रही बहाई महिलाओं को काम से निकाल दिया गया, गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, यातना दी गयी या फांसी पर चढ़ा दिया गया। जिन्हें जीने दिया गया, उन्हें भी विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र से वंचित कर दिया गया।
शीराज़ की उन 10 साहसी महिलाओं के सम्मान में तथा न्याय और समानता के जिस लक्ष्य के लिये उन्होंने अपना जीवन बलिदान किया था, उल लक्ष्य के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय बहाई समुदाय पूरे विश्व के लोगों को – चाहे वे कलाकार हों, संगीतकार हों, फिल्म निर्माता हों या किसी भी अन्य रचनात्मक क्षेत्र में कार्यरत हों - आमंत्रित करता है। ईरान में स्त्री-पुरूष समानता के लिये लंबे समय से जारी संघर्ष और प्रयासों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के इस योगदान में उन 10 महिलाओं के बारे में गीत, उनके जीवन पर लघु वीडियो, महिलाओं की अपनी स्मृतियां, ग्राफिक आर्ट, लिखित सामग्री, सोशल मीडिया पोस्ट या सार्वजनिक आयोजन और स्मारक या स्मृति पत्र शामिल हो सकते हैं।
यह अभियान जून में शुरू होगा और एक वर्ष तक चलेगा, इसका सर्वाधिक गहन चरण जून के पहले तीन सप्ताहों में, 18 जून को उन्हें फांसी दिये जाने की 40वीं बरसी तक होगा। 

फहंदेज ने कहा -“ईरान के अधिक से अधिक लोग सामाजिक न्याय की तलाश में एकजुट हो रहे हैं और उन्होंने देश के समक्ष उपस्थित सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक स्त्री-पुरूष समानता पर ध्यान केंद्रित किया है।....हम आशा करते हैं कि एक जुट होकर हम न केवल शीराज की उन 10 बहाई  महिलाओं के प्रति सम्मान व्यक्त कर सकते हैं बल्कि ईरान की उन तमाम महिलाओं के प्रति भी जो स्त्री-पुरूष समानता के सिद्धांत को आगे बढ़ा रही हैं और जिन्होंने शोषण और दमन का सामना करते हुए भी एक बेहतर भविष्य के निर्माण में योगदान किया है। आईये हम अपने धैर्य के साझा अनुभवों तथा ईरान के लिये अपने सामूहिक प्रयासों और बलिदानों के आधार पर संगठित हों, एकजुट हों ताकि हम यह दिखला सकें कि किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि के होने के बावजूद हम एक सूत्र में बंधे हैं। हम आशा करते हैं कि इन 10 महिलाओं के बलिदान का स्मरण ईरान में न्याय और स्त्री-पुरूष समानता पर विमर्श को और ज्वलंत और सशक्त बनायेगा। हम सबकी कहानी एक है और हम अपने साझा लक्ष्य हासिल करने तक अपनी आवाज़ उठाते रहेंगे।“
पृष्ठभूमि 
18 जून 1983 को 17 वर्ष की एक लड़की और 50वें वर्ष के दशक से गुजर रही एक महिला सहित 10 बहाई महिलाओं को जिनमें अधिकांश उम्र के बीसवें वर्ष के दशक में थीं, शीराज़ के शोगॉन स्क्वैयर पर फांसी दी गयी थी क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ने से इन्कार कर दिया था। स्तब्ध कर देने वाली इस घटना की पूरे विश्व के लोगों और मानवाधिकार समूहों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद हुई इस बर्बर घटना के दो रात पहले ही उसी चौक पर छः बहाई पुरूषों को (जिनमें कुछ इन 10 महिलाओं के संबंधी थे) ईरानी अधिकारियों ने फांसी दे दी थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई घोर आलोचना के बाद सिर्फ हत्याएं रुकीं लेकिन ईरान में बहाईयों का उत्पीड़न आज तक जारी है और उनके उत्पीड़कों को मानवाधिकार हनन के लिये कोई दंड नहीं मिलता। 10 बहाई महिलाओं को वर्ष 1982 के अक्तूबर और नवंबर माह में गिरफ्तार किया गया था। इनमें से कई को पहले सेपाह हिरासत केंद्र में रखा गया और बाद में आदिलाबाद कारागार में भेज दिया गया। रेवोल्यूशनरी गार्ड द्वारा उनसे बड़ी क्रूरता से पूछताछ की गयी और यातना दी गयी ताकि उन्हें अपना धर्म छोड़ने पर विवश किया जा सके। उन्हें कोई वकील रखने के अधिकार से वंचित किया गया, जन अदालत में सुनवाई से वंचित रखा गया और अंततः शीराज़ के शरिया जज द्वारा “यहूदीवाद“, “इस्राईल के लिये जासूसी“ और बच्चों को नैतिक शिक्षा देने के आरोपों में फांसी की सज़ा सुनायी गयी। 

इनमें से प्रत्येक महिला को फांसी से बचने के लिये अपना धर्म छोड़ने और इस्लाम क़बूल करने के लिये अनेक बार विवश किया गया लेकिन उनमें से कोई भी ईरानी अधिकारियों द्वारा उनके लिये तैयार बयान पर हस्ताक्षर करने के लिये राज़ी नहीं हुईं। 18 जून 1983 को उन्हे गुप्त रूप से शोगॉन स्क्वैयर पर ले जाया गया और एक दूसरे के सामने ही एक-एक कर फांसी दे दी गयी। उनके परिवारों को उनकी मौत की खबर तक नहीं दी गयी, उनके शव परिजनों को नहीं सौंपे गये और उनका अंतिम संस्कार भी धार्मिक गरिमा के साथ नहीं किया गया। माना जाता है कि उन्हें शीराज़ के बहाई कब्रिस्तान में दफना दिया गया, जिसे बाद में तोड़कर 2014 में सांस्कृतिक और खेलकूद केंद्र भवन बना दिया गया। 

उस दिन जिन महिलाओं को फांसी दी गयी उनके नाम हैं-
मोना महमूदनेजाद, 17 वर्ष;
रोया एशरगी, 23 वर्ष, उनकी माँ एज़्ज़त जानमी एशरगी के साथ फांसी दी गयी;
सिमिन साबेरी, 24 वर्ष;
शाहीन (शिरीन) दलवंद, 25 वर्ष;
अख्तर साबेत, 25 वर्ष;
माहशिद निरुमंद, 28 वर्ष;
ज़रीन मोग़िमी – अबवांच, 29 वर्ष;
ताहिरी आरज़ूमंदी सियावाशी, 30 वर्ष; उनके पति जमशेद सियावाशी को दो दिन पहले फांसी दी गयी थी;
नुसरत गुफरानी यलदेई, 46 वर्ष, दो दिन पहले उनके पुत्र बहराम यलदेई को फांसी दी गयी; 
एज्ज़त जानमी एशराग़ी, 57 वर्ष, उनकी पुत्री रोया एशरागी के साथ फांसी दी गयी, उनके पति इनायतुल्ला एशरागी को दो दिन पहले फांसी दी गयी थी। 








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