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बातें मीडिया की

एबीपी न्यूज़ ने 700 लोगों को नौकरी से निकाला!
इस्तीफा देने के बाद कुछ इस तरह से दर्द बंया किया पत्रकारों ने

नई दिल्ली

१६ फरवरी २०१७

आनंद बाजार पत्रिका का अंग्रेजी अखबार (The Telegraph)  छोड़ने के बाद पत्रकार विश्‍वजीत रॉय ने ‘डेली ओ’ (daily O) वेबसाइट पर खुले पत्र (Open Letter ) के जरिये अपने मन की पीड़ा बयां की है। इस ओपन लेटर में रॉय का कहना है, ‘आखिरकार तमाम दबावों का सामना करते हुए 700 अन्‍य पत्रकारों व गैर पत्रकारों की तरह मैंने ‘द टेलिग्राफ’ (The Telegraph) से इस्‍तीफा दे दिया। इस राउंड में द टेलिग्राफ के 20 पत्रकार, जिनमें 17 जिला संवाददाता (district correspondents) और तीन बंगाल की रिपोर्टिंग टीम के थे, को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी।


एबीपी प्रबंधन ने मुझे इस्‍तीफा लिखने की अनुमति नहीं दी लेकिन उन्‍होंने एक लाइन में लिखे हुए फॉर्मेट पर मेरे हस्‍ताक्षर ले लिए जिसमें कहीं नहीं लिखा था कि कंपनी अपने वर्कफोर्स में कटौती कर रही है।’ इसके बजाय कंपनी ने यह दिखाया कि मैंने अपनी इच्‍छा के अनुसार संस्‍थान को छोड़ा है। जब मैंने पेमेंट वाले दूसरे फॉर्मेट पर हस्‍ताक्षर किए तो मुझे न तो लिखित में ‘स्‍पेशल पैकेज’ को लेकर कोई आश्‍वासन दिया गया और न ही मेरे बकाया को लेकर कुछ कहा गया। जब मैंने कहा कि इस पर लिखित में तो कुछ दीजिए तो संपादकीय टीम के एक अधिकारी ने उस पर अपने हस्‍ताक्षर कर दिए। कंपनी के एचआर विभाग की ओर से कहा गया कि कंपनी औपचारिक रूप से अलग-अलग लोगों से किसी तरह का कोई वादा नहीं करेगी, फिर चाहे कंपनी और मेरे बीच अलग से कुछ भी करार हुआ हो। मुझे दो कॉगजों पर हस्‍ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया गया, जिसका उद्देश्‍य कंपनी प्रबंधन द्वारा मेरा इस्‍तीफा लेना था।

हालांकि मैं एक मार्च को कार्यमुक्‍त हो जाऊंगा लेकिन मेरा इस्‍तीफा देने से पहले ही मेरे द्वारा कंप्‍यूटर सिस्‍टम के इस्‍तेमाल पर रोक लगा दी गई। इस तरह जताया जा रहा था कि जैसे मेरी वहां पर कोई जरूरत ही नहीं हैं और मैं खुद को उपेक्षित समझूं। इसके अलावा मेरे एंट्री स्‍वाइप कार्ड (entry swipe card) को भी कंपनी में जमा करने को कहा गया। यही नहीं, मुझसे यह भी कहा गया कि जब तक मैं उनकी बात नहीं मानूंगा, वे मेरे बकाया (dues) का भुगतान भी नहीं करेंगे। उस दिन मैं उनके लिए बाहरी व्‍यक्ति हो गया। अब यदि मेरे बकाया को क्‍लीयर करने के लिए एचआर डिपार्टमेंट अथवा कंपनी से कोई कॉल आएगी तो मुझे उनसे स्‍वागत कक्ष (reception) में जाकर मिलना पड़ेगा। कुल मिलाकर अब मैं कंपनी प्रबंधन का दयापात्र बनकर रह गया हूं जिसने 20 वर्षों से ज्‍यादा समय तक इसकी सेवा की।


मुझे कंपनी पर भरोसा करने के लिए कहा गया है जिसने वित्‍तीय संकट के नाम पर इतनी बड़ी कार्रवाई करने के बारे में एक बार भी नहीं सोचा और न ही स्‍टाफ से इस बारे में बात की और 700 लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। कंपनी ने हम लोगों को सम्‍मानजनक विदाई देने की जहमत नहीं उठाई सिवाय इसके कि हमें सिर्फ एक अच्‍छे पैकेज का आश्‍वासन दिया गया लेकिन इसके बजाय सिर्फ कागज का एक टुकड़ा थमा दिया गया। समाचार मीडिया से साभार।




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