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"जिसकी हिंदी को जर्मनी ने अपनाया, उसी को भारत ने ठुकराया!
"सूक्ष्म लघु मध्यम उद्योग मंत्रालय के हिंदी अधिकारी की आत्म व्यथा"

आकाश श्रीवास्तव

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

नई दिल्ली १२ जून २०१७

भारत सरकार के लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्योग मंत्रालय के हिंदी अधिकारी हरेंद्र प्रताप सिंह पिछले तीन सालों से हिंदी के साथ हो रहे सौतेले व्यवहार दोहरे मापदंड को लेकर उपवास पर हैं। अफसोस तो इस बात की है कि मंत्रालय में उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। सूत्र बताते हैं कि यहां तक मंत्रालय में हिंदी के साथ हो रहे इस तरह के दोहरे मापदंड़ और विसंगति को लेकर उन्होंने मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों और खुद मंत्री तक को लिखिति शिकायत भी की लेकिन संबंधित मंत्रालय के अधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगी। जब बात इतनी पर भी नहीं बनी तो वे गांधीवादी पर उतर आए और पिछले लगभग साढ़े तीन साल से कार्यालय के कार्यावधि के दौरान उपवास शुरू कर दी। इस दौरान वे सुबह आठ बजे से लेकर शाम आठ बजे तक न तो कुछ खाते हैं और न पीते हैं। हम बता दें कि मंत्रालय अपने मंत्रालय के काम-काज को प्रचारित प्रसारित करने के लिए लघु उद्योग समाचार पत्रिका प्रकाशित करती है। जिसके हरेंद्र प्रताप सिंह तकरीबन दो दशक से मुख्य संपादक और निदेशक प्रचार का कार्य देख रहे हैं।


हरेंद्र प्रताप सिंह, सूक्ष्म लधु मध्यम उद्योग मंत्रालय के समाचार पत्रिका के मुख्य संपादक।

हम आपको बता दें हरेंद्र प्रताप सिंह एक वरिष्ठ, प्रतिभाशाली, पेशेवर पत्रकार, लेखक और कवि हैं। उन्होंने किंग्विन प्रकाशन से ‘गदर के 150 साल’ का  सफल और शानदार प्रकाशन किया। यही नहीं उनकी हिंदी प्रतिभा का लोहा जर्मनी और आस्ट्रिया ने माना और अपनाया भी। उनकी हिंदी कविता “गंगनांचल” को जर्मनी के 10 विश्वविद्यालयों और आस्ट्रिया के 4 विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है। जो अपने आप में असाधारण है। जर्मन सरकार ने हरेंद्र प्रताप सिंह की प्रतिभा का चर्चा करते हुए टिप्पणी की और कहा- “भारत में जिस तरह से हिंदी और अपने संस्कृति को लेकर वे चिंतित हैं, उसी तरह से जर्मनी के लोगों को भी अपनी भाषा संस्कृति को लेकर चिंतन करना चाहिए” हरेंद्र प्रताप सिंह की उस कविता की एक बानगी देखिए जो जर्मनी और आस्ट्रिया में पढ़ायी जाती है – “भूलने से हिंदी भूल जाती है संस्कृति, पता नहीं चलता, कब सिर से आंचल सरका देती है अंग्रेजी ”।

यह कितनी गर्व और शर्म की बात है। गर्व इसलिए कि हिंदुस्तान के एक हिंदी कवि की रचना को जर्मनी और आस्ट्रिया जैसे देशों में मान और सम्मान मिल रहा है। शर्म इसलिए कि उसी हिंदी लेखक, कवि और मंत्रालय के अधिकारी की बात सुनने के लिए न तो संबंधित मंत्रालय का कोई अधिकारी और न खुद मंत्री उनकी बात को सुनने के लिए तैयार हैं। इससे बड़ी बिडंबना और क्या हो सकती है। हिंदी के विकास और उत्थान को लेकर हरेंद्र प्रताप सिंह की संघर्ष की कहानी 30 जनवरी 2014 महात्मा गांधी की पूण्यतिथि से शुरू हुई थी। उस समय कांग्रेस के अगुवाई वाली यूपीए सरकार थी। आज जबरजस्त बहुमत के साथ वाली भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार है, लेकिन व्यथा यह है कि न तो यूपीए ने हरेंद्र प्रताप सिंह की बात सुनी और न ही मोदी की एनडीए सरकार हरेंद्र प्रताप सिंह की मांग और बात सुनने के लिए तैयार है।


यही नहीं हरेंद्र प्रताप सिंह ने सन् 2013 में कैट में हिंदी की दुर्दशा और अवहेलना को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खट-खटाया जहां उन्हें कोर्ट से विजय मिली और कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि हिंदी को लेकर जो विसंगतिया दोहरापन है उन्हें दूर किया जाय लेकिन सरकार ने कोर्ट के आदेश को भी ठेंगा दिखा दिया और आज तक उसके आदेश का अनुपालन नहीं किया। हरेंद्र प्रताप सिंह की कार्य की एक और विशेषता आपका और बताते हैं जो विरलों में देखने को मिलती है। 1 मई 2017 से चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छाग्रह अभियान से प्रेरित होकर 1 मई से स्वंय स्वच्छता अभियान शुरू किए हुए हैं। वे रोजाना अपने कार्यालय में लगभग डेढ़ से दो घंटा खुद साफ-सफाई का कार्य करते हैं। यहां तक कार्यालय में उनसे मिलने आने-जाने वाले मेहमानों को वे खुद पानी ही पिलाते हैं, किसी की सहायता नहीं लेते हैं।


हरेंद्र प्रताप सिंह मंत्रालयों में गठित हिंदी की सलाहकार संसदीय समितियों के काम-काज से भी नाराज बताए जाते हैं। उनकी यह नाराजगी भी जायज है। क्योंकि यह सत्य है कि मंत्रालयों में हिंदी की संसदीय सलाहकार की जो समितियां हैं वो राजभाषा को लेकन न तो गंभीर है और न चिंतित हैं। ज्यादातर इसके सदस्य सरकारी कार्यालयों का भ्रमण तो करते हैं लेकिन हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर गंभीरता नहीं दिखाते। उन्हें कार्यालयों में हिंदी का विकास का कोई रूप रेखा तो नहीं नजर आता लेकिन उन्हें उपहार देकर खुश कर लौटा दिया जाता है और हिंदी अपनी उसी बीमार सैय्या पर कराहती रह जाती है। हर साल राजभाषा दिवस पर मनाने को भी हरेंद्र प्रताप सिंह महज एक दिखावा और ढ़ोंग मारते हैं। क्योंकि इससे हिंदी का न तो विकास होता है और न उत्थान होता है।



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