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जीएसटी ने छोटे अखबरों को ही नहीं बड़े अखबारों को भी पहुंचाया बर्बादी पर

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

नई दिल्ली

३१ जुलाई २०१८

नई दिल्ली। दुनिया के कई हिस्‍सों में प्रिंट मीडिया खत्‍म होने के कगार पर है। लेकिन भारत में ठीक इसके उल्टा है। भारत में अखबार न सिर्फ खुद को बचाने में कामयाब रहे हैं बल्कि इनमें बढ़ोतरी भी हुई है। कच्‍चे माल की कीमतों में वृद्धि के साथ ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए का कमजोर होना और चीन में रद्दी कागज के आयात पर प्रतिबंध लगने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में अखबारी कागज के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। ऐसे में इंडस्‍ट्री के लिए चिंतित होना स्‍वाभाविक है। क्‍योंकि, प्रिंट मीडिया में करीब 30-40 प्रतिशत खर्चा तो अखबारी कागज पर ही हो जाता है।


ऐसे में अब इसकी कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी होने से प्रिंट मीडिया प्रतिष्‍ठानों की चिंता बढ़ गई हैं। लेकिन हाल ही में अखबारी कागजों  की कीमतों में हुई वृद्धि से हालात बहुत अच्‍छे नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इससे इंडस्‍ट्री डूबने की कगार पर पहुंच सकती है। अखबारी कागजों की कीमतों में वृद्धि से देश में प्रिंट इंडस्‍ट्री पर 4600 करोड़ रुपए से ज्‍यादा का वार्षिक बोझ पड़ेगा। यानि जीएसटी लगने से छोटे अखबारों के साथ बड़े अखबारों की भी कमर टूट रही है।

यदि पिछले साल की बात करें तो इन दिनों में अमेरिकी डॉलर की कीमत जहां 64.16 रुपए थी, वह अब बढ़कर 68.62 रुपए हो गई है। पिछले साल न्‍यूजप्रिंट की कीमतें जहां 36000 रुपए प्रति टन थीं, वह अब बढ़कर 55000 रुपए प्रति टन हो गई हैं। भारत में सालाना रूप से न्‍यूजप्रिंट की मांग 2.6 मिलियन टन है। ऐसे में न्‍यूजप्रिंट की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने से इंडस्‍ट्री को वार्षिक रूप से 4600 करोड़ रुपए से ज्‍यादा के नुकसान की आशंका है।


न्‍यूजप्रिंट की कीमतों में हुई वृद्धि के अलावा देश में न्‍यूजप्रिंट के वास्‍तविक खरीदारों को लेकर भी स्थिति स्‍पष्‍ट न होने के कारण यह मसला गहराता जा रहा है। 'इंडियन न्‍यूजप्रिंट मैन्‍यूफैक्‍चरर्स एसोसिएशन' के एक सदस्‍य के अनुसार, 'पहले सिर्फ पंजीकृत मिल्‍स और पब्लिशर्स को ही रियायती टैक्‍स का लाभ मिला करता था। लेकिन जब से जीएसटी लागू हुआ है, अन्‍य पार्टियां भी न्‍यूजप्रिंट खरीद रही हैं जबकि पहले ऐसा नहीं था और उन्‍हें इसे दूसरे ग्रेड पेपर की तरह बेचा जाता था।'


न्‍यूजप्रिंट की कीमतों में हुई बेतहाशा वृद्धि का असर 'एचटी मीडिया'  के वित्‍तीय वर्ष 2019 की प्रथम तिमाही के नतीजों पर देखा जा सकता है, जिसमें कुल लाभ में करीब 86 प्रतिशत की कमी देखने को मिली थी। 'एचटी मीडिया लिमिटेड' और 'हिन्‍दुस्‍तान मीडिया वेंचर्स की चेयरपर्सन और एडिटोरियल डायरेक्‍टर शोभना भरतिया का पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहना था, 'न्‍यूजप्रिंट की ज्‍यादा कीमतों के कारण हमारी ऑपरेटिंग परफॉर्मेंस भी काफी प्रभावित हुई।'

इस अस्‍प्‍ष्‍टता के कारण जीएसटी की दरों में काफी छेड़छाड़ हो रही है। (पहले न्‍यूजप्रिंट पर पांच प्रतिशत जीएसटी था जबकि अन्‍य ग्रेड पेपर पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगता था।) अन्‍य पार्टियों द्वारा न्‍यूजप्रिंट की खरीद किए जाने से पब्लिशर्स के सामने आपूर्ति का संकट हो गया है। महाराष्ट्र का जाना माना अखबार सकाल का भी कहना है कि न्‍यूजप्रिंट की कीमतों की बात है तो इस साल इसने लगभग सभी को प्रभावित किया है। न्‍यूजप्रिंट का ऑर्डर छह से नौ महीने पहले एडवांस में दिया जाता है। ऐसे में कई लोगों की गणित गड़बड़ा गई है।


ऐसे में कुछ लोग तो सिर्फ न्‍यूजप्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण ही घाटे में जा सकते हैं। इंडस्‍ट्री की यही सच्‍चाई है।' इनपुट कॉस्‍ट में 50 प्रतिशत से ज्‍यादा की बढ़ोतरी होने और क्षतिपूर्ति के लिए कोई निश्चित उपाय न होने के कारण इंडस्‍ट्री को एक साल में करीब 4600 करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है। अखबारों की बात करें तो हिंदी के सबसे ज्‍यादा पढ़े जाने वाले अखबारों में से एक 'दैनिक जागरण'  सालाना करीब 1,80,000 टन न्‍यूजप्रिंट खरीदता है। ऐसे में न्‍यूजप्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण अखबार को करीब 290 करोड़ रुपए का अतिरिक्‍त भुगतान करना पड़ा है।

इसमें लगभग पांच प्रतिशत रद्दी कागज वापस आया है। अखबार की वर्ष 2016-17 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, 'कुल खर्चे में न्‍यूजप्रिंट पर 39 प्रतिशत से ज्‍यादा खर्च किया गया है और लगभग 75 प्रतिशत न्‍यूजप्रिंट घरेलू मार्केट से लिया गया है। ऐसे में लगभग 20-25 प्रतिशत आयात किया गया है।' इंडस्‍ट्री से जुड़े एक अन्‍य वरिष्‍ठ व्‍यक्ति ने बताया, 'हम लागत में कमी के बारे में सोच रहे हैं। इसके अलावा हमने अखबार की कीमत में एक रुपए की वृद्धि की है। इससे भी कुछ राहत मिलेगी, ज्‍यादा नहीं। अखबार की कीमत बढ़ने से इस बढ़ोतरी में केवल 35-40 प्रतिशत तक ही राहत मिल सकती है।'


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