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विज्ञान एवं रक्षा तकनीकि

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सी. डी. एस.) पद-स्थापना की प्रथम वर्षगांठ
आंतरिक समीक्षा, पुनः मूल्यांकन एवं भविष्य की संभावनाएं

मेजर जनरल जे के एस परिहार, एस एम, वीएसएम और बार (सेनि)

पूर्व अपर महानिदेशक, सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा

रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय सामरिक मामलों के विषेशज्ञ

भारतीय सेना  के प्रथम  चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के रूप में जनरल बिपिन रावत के कार्यकाल के एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) एवं सीडीएस के कार्य संचालन एवं उनके द्वारा भविष्य में सैन्य  एकीकृत सामरिक प्रणाली के विकास और सेना के आधुनिकरण हेतु किए गए नीतिगत  एवं भविष्य में थियेटर कमान संचालन व्यवस्था हेतु किए जाने  ढांचागत परिवर्तनों के आधार पर  भविष्य की भारतीय सेना  में सीडीएस  तथा सेना प्रमुखों की भूमिका और कार्य प्रणाली संचालन में होने वाले परिवर्तनों, अंतर्निहित बाधाओं , भविष्य की राष्ट्रीय रक्षा नीति के सिद्धांतों   पर बहुआयामी ,निष्पक्ष विश्लेषण एवम् मूल्यांकन आवश्यक एवं सामयिक है. वैसे तो भारत में स्वतंत्रता पश्चात  1947 से ही  तीनों सेनाओं में वरिष्ठतम सेना अध्यक्ष द्वारा  संयुक्त सेनाध्यक्ष समिति के प्रमुख का अतिरिक्त दायित्व निभाने की प्रणाली प्रचलित है. इसी प्रणाली के अंतर्गत ही भारत ने 1965 और 1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान सेना  के तीनों अंगों में बेहतर सामंजस्य  का प्रदर्शन कर शानदार विजय हांसिल की थी.


सीडीएस, विपिन रावत।

हालांकि समय के साथ युद्ध रणनीति के बदलते परिपेक्ष्य के अनुरूप सन 2000  में सबसे पहले मंत्रियों के समूह और कारगिल संघर्ष समीक्षा समिति ने सेना के तीनों अंगों में त्वरित एवं सार्थक सामंजस्य हेतु सीडीएस एवं सैन्य मामलों के विभाग के सृजन की अनुशंसा की थी.इस सन्दर्भ में  गंभीर एवं व्यापक विचार विनमय के बावजूद भी समुचित सहमति न होने की वजह से भारत सरकार द्वारा सीडीएस के एक तात्कालिक एवं उपयोगी विकल्प के रूप में अंतर विभागीय एवं अंतर सैन्य सेवा समन्वय हेतु 23 नवंबर 2001 को एकीकृत रक्षा संस्थान (आई.डी.एस) की संरचना की गई जिसकी कमान लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारी को सौंपी गई.विगत दो दशकों में आईडीएस ने रक्षा उपग्रह नियंत्रण केंद्र, रक्षा साइबर एजेंसी, विशेष अभियान प्रभागों के निर्बाध कामकाज को अधिक सुगम बनाया है , साथ ही हथियारों की खरीद, संयुक्त सिद्धांतों, प्रशिक्षण और अन्य प्रक्रियाओं में पर्याप्त तालमेल का तंत्र भी आईडीएस के द्वारा ही संभव हुआ है.अंतोगत्वा सरकार एवं सेना के तीनों अंगों के स्तर पर गंभीर विचार विनमय के पश्चात सन 2018 में सैन्य मामलों के विभाग  की संरचना एवं सीडीएस की नियुक्ति पर सहमति होने के पश्चात 15 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री ने सीडीएस एवं डीएमए के सृजन की घोषणा की .तत्पश्चात 30दिसंबर2019 को भारत सरकार  की प्रशासकीय कार्य प्रणाली आवंटन नियमों  (दूसरी अनुसूची सहित) 1961 में उपयुक्त संशोधनों के माध्यम से सैन्य मामलों के विभाग  की संरचना एवं सीडीएस की नियुक्ति एवं नवगठित रक्षा विभाग और सैन्य मामलों के विभागों के बीच विषयों के निर्माण के साथ-साथ अन्य विषयों के पुनर्आवंटन को भी अधिसूचित किया गया है .डीएमए और सीडीएस के कार्यों को सुगम बनाने के लिए मौजूदा आईडीएस के विभिन्न वर्टिकल और पदाधिकारियों को नवगठित डीएमए में समाहित किया गया है .इसके साथ ही आईडीएस प्रमुख को सह सीडीएस के रूप में नामित किया गया है.

हालांकि  आईडीएस के एक प्रमुख अंग एकीकृत खरीद परिषद को रक्षा सचिव के तहत रक्षा विभाग में समाहित किया गया है . डीएमए में सशस्त्र सेना की तीनों सेवाओं , भारतीय प्रशासनिक, विदेशी, वित्त और अन्य संबद्ध सेवाओं से अधिकारी नियुक्त किये गये हैं जिनमें सचिव रैंक के अधिकारी के रूप में एक वाइस सीडीएस, एक अपर सचिव और दो आईएएस अधिकारियों सहित पांच संयुक्त सचिव शामिल हैं. सीडीएस को दिए गए अधिदेश से उन्हें संयुक्त चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के स्थायी अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की दोहरी जिम्मेदारी भी  दी  गई है .यद्यपि सीडीएस एवं सेना प्रमुख समान रैंक के अधिकारी हैं , लेकिन उन्हे तीनों सेना प्रमुख के मुक़ाबले वरिष्ठता प्राप्त है. सीडीएस सभी त्रि-सेवा मामलों पर रक्षा मंत्री के प्रमुख सैन्य सलाहकार के रूप में भी कार्य करेंगें ,हालांकि  तीनों सेनाओं से संबन्धित युद्ध संचालन,  प्रसाशनिक एवं  कार्मिक मामलों में सैन्य प्रमुख स्वतंत्र निर्णय के अधिकारी रहेंगे और सैन्य सलाहकार के रूप में भी कार्य करेंगें. इसके अलावा उन्हें रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में गठित रक्षा अधिग्रहण परिषद के सदस्य तथा परमाणु कमान प्राधिकरण के सैन्य सलाहकार के रूप में भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने का जिम्मा सौंपा गया है .हालांकि सीडीएस को संयुक्त थियेटर कमान की स्थापना सहित सैन्य  संचालन में संयुक्तता लाकर संसाधनों के  इष्टतम उपयोग के लिए सैन्य कमानों के पुनर्गठन  ताकि कार्यात्मक तालमेल और अभिसरण में वृद्धि करके वहां सशस्त्र बलों की युद्धक क्षमताओं में वृद्धि करने की व्यापक जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें सैन्य कामकाज के सभी स्तरों पर फिजूल खर्चों को कम करने के लिए तंत्र तैयार करने तथा एकीकृत क्षमता विकास योजना के अनुवर्ती के रूप में पांच वर्षीय रक्षा पूंजी अधिग्रहण योजना और दो वर्षीय रोल-ऑन वार्षिक अधिग्रहण योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी भी दी गई है .लेकिन उनके पास ऐसे  दिशा निर्देशों   को लागू करने की प्रशासनिक और वित्तीय शक्ति बहुत कम है.


सांकेतिक तस्वीर।

यहां तक कि डीएमए और सीडीएस के निर्माण पर 30 दिसंबर 2019 की हालिया अधिसूचना में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि रक्षा सचिव की अध्यक्षता में रक्षा विभाग "रक्षा नीति और रक्षा के लिए तैयारी और ऐसे सभी कृत्यों सहित भारत की रक्षा और उसके हर हिस्से के लिए जिम्मेदार होगा, जैसा कि युद्ध के समय में इसके अभियोजन के लिए अनुकूल हो सकता है और प्रभावी विमोचन के लिए समाप्ति के बाद" . इसके अलावा रक्षा नीति की योजना बनाने, बजट आवंटन, पूंजी अधिग्रहण (हथियारों की खरीद), ब्रिगेडियर और रक्षा संबंधी संसदीय मामलों जैसे अन्य महत्वपूर्ण विषयों जैसे पदोन्नति और उच्च नियुक्तियों सहित सशस्त्र बलों का सामान्य प्रशासन, प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ अंतर, विदेशों के साथ रक्षा सहयोग और रक्षा मंत्रालय के भीतर सभी गतिविधियों, रक्षा खातों, तटरक्षक, सीमा सड़क संगठन और अन्य संबद्ध संस्थानों का समन्वय भी  रक्षा सचिव  के पास ही रहेगा.यद्यपि सीडीएस का दर्जा कैबिनेट सचिव के बराबर है और रक्षा सचिव से अधिक है, फिर भी उन्हें एक पदेन सचिव के रूप में नवगठित सैन्य मामलों के विभाग के प्रमुख के रूप में रक्षा मंत्रालय में काम करना है, जहां रक्षा सचिव सीडीएस सहित रक्षा मंत्रालय में सभी विभागों और सचिवों के बीच एक बिंदु प्रमुख एजेंसी है .इस प्रकार सभी व्यावहारिक उद्देश्य के लिए रक्षा सचिव भारतीय रक्षा मंत्रालय की कुंजी रखते हैं।


सांकेतिक तस्वीर।

अतः मौजूदा दिशा निर्देशों के अंतर्गत सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर डीएमए और सीडीएस की बहुत ही सीमित भूमिका है . सीडीएस को अधिक कार्यात्मक शक्ति दी जानी चाहिए और रक्षा सचिव के साथ अधिनिर्णय विभाग के रूप में काम करने के बजाय रक्षा मंत्रालय में प्रशासन का नोडल बिंदु होना चाहिए . इन भारी विसंगतियों के बावजूद, सरकार रक्षा मंत्रालय के कामकाज में पहली बार सेना को शामिल करने के लिये प्रशंसा की हकदार है अन्यथा आज तक सेना  को आधिकारिक तौर पर रक्षा मंत्रालय के लिए एकीकृत सेवाओं के रूप में अधिसूचित किया गया था जिसके अनुसार सेना की  रक्षा मंत्रालय में भागीदारी एक सलाहकार समूह तथा  उन्हें दिए गए निर्देशों को लागू करने वाली एजेंसियों के रूप में ही सीमित थी .

इसी परिपेक्ष में इस नई प्रणाली के तहत हमारे सशस्त्र बलों की परिचालन और कार्यात्मक क्षमताओं को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों का आकलन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है  जितना सीडीएस द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में आने वाली बाधाओं का विश्लेषण है . सीडीएस को सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी यह है कि वह थिएटर कमान की संरचना एवं प्रस्तावित परिवर्तन के तहत भारतीय सशस्त्र बलों के मध्य बेहतर तालमेल और प्रभावता को सुनिश्चित करे , ताकि नई प्रणाली के तहत वित्तीय आवंटन , सेना प्रमुखों और वर्टिकल की भूमिका को अच्छी तरह से परिभाषित करने के लिए एक प्रोटोकॉल निर्धारित किया जा सके . मेरे विचार से सीडीएस के लिए सबसे कठिन कार्य नई प्रणाली में जमीनी स्तर पर कार्यात्मक सहयोग सुनिश्चित करना है, विशेष रूप से तकनीकी विशेषज्ञता, परिचालन भूमिका में विशाल विविधता और साथ ही शैक्षिक, सामाजिक पृष्ठभूमि और भारतीय सशस्त्र बलों की तीनों सेनाओं के कामकाज के लोकाचार की विभिताओं को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समंजस्य बनाए रखना.  इसके साथ ही सीडीएस को एकीकृत थिएटर कमान के प्रारूप में तीनों सेनाओं के सेना प्रमुख  वर्टिकल संस्थानों तथा क्षेत्रीय कमांडरों की भावी भूमिका भी सुनिश्चित करनी होगी . वर्तमान व्यवस्था में सशस्त्र बलों के विभिन्न अंगों की प्रशासनिक, सामरिक  रण नीति और परिचालन गतिविधियों पर सीडीएस का कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है . हमें सीडीएस पद के अमेरिकी और चीनी मॉड्यूल का पालन करने के बजाय देश की जरूरत के अनुसार थिएटर कमानों के मॉड्यूल की संकल्पना करने के साथ - साथ राजनीतिक और नौकरशाही पदानुक्रम की भागीदारी को एक हद तक चिन्हित करने का कार्य अति महत्वपूर्ण होगा . हमारी रक्षा प्रणाली में सशस्त्र सेना मुख्य रूप से चीन और पाकिस्तान जैसे शत्रुतापूर्ण पड़ोसी देशों के संदर्भ में राष्ट्रीय सीमाओं और संप्रभुता के हितों की रक्षा करने के लिए जिम्मेदार है, जबकि अमेरिकी मॉड्यूल सीधे सीधे तौर पर विश्व सैन्य सुपर पावर के रूप में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हितों से जुड़ा हुआ है. इसी तरह थिएटर कमानों का चीनी मॉड्यूल सीधे तौर पर चीन की विस्तारवादी नीतियों से जुड़ा हुआ है जहां  चीनी सेना (पीएलए) में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की आधिकारिक सैन्य विंग के रूप में कामकाज के सभी स्तरों पर कम्युनिस्ट पार्टी के निरंतर  राजनीतिक जुड़ाव को  सुनिश्चित करने के लिए है न कि चीन सरकार की सेना के रूप में कार्य करना.


सांकेतिक तस्वीर।

ये दोनों ही मॉड्यूल भारतीय परिपेक्ष में बेहद अवास्तविक हैं और भारत की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के हितों से बिलकुल विपरीत है. इसलिए एक व्यावहारिक ,सशक्त एवं कुशल रक्षा प्रणाली को अक्षुण्ण रखने की अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी विशेष रूप से भारत सरकार के साथ-साथ सीडीएस के कामकाज पर भी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सशस्त्र बलों की अराजनैतिक स्थिति निर्विवाद और किसी भी संदेह से परे बनी रहे. इस प्रमुख राष्ट्रीय और संवैधानिक हित को यथावत बनाए रखने के साथ-साथ राष्ट्रीय रक्षा प्रणाली को एक गतिशील और प्रगतिशील तंत्र के रूप में मजबूत करने के लिए सरकार को सीडीएस की चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार करना चाहिए और उसे अधिक जीवंत और सेवा उन्मुख बनाना चाहिए . इ

इन्ही कारणों  से तीनों सेनाओं थल, वायु और नौ सेना से क्रमश: सीडीएस का चयन वर्तमान चयन प्रणाली के मुक़ाबले  सबसे अच्छा विकल्प है जिसमें तीनों  सेना  प्रमुखों और सेना, नौसेना और वायु सेना के 17 वरिष्ठतम कमांडरों में से सीडीएस के चयन की मौजूदा प्रक्रिया से ज्यादा पारदर्शिता ,निष्पक्षता  और सीडीएस की सभी सेना प्रमुखों से वरीयता मेँ प्रथम रहने की परिपाटी अक्षुण्ण रखी जा सकती है.

इसी तरह तीनों सेनाओं  के एकीकरण और संयुक्त संचालन की थियेटर कमान प्रणाली के गठन को ध्यान में रखते हुए सेना के भावी पुनर्गठन ,नई व्यवस्था में अधिकारियों तथा अन्य रैंक की सेवा शर्तों , करियर ,प्रमोशन इत्यादि से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों के अलावा नई आधुनिक सरंचना में  तीनों सेना प्रमुख , सीडीएस तथा  रक्षा सचिव के कर्तव्यों और भूमिका  सशस्त्र बलों के तीनों अंगों की भावी भूमिका का पुनर्गठन, कैरियर बढ़ाने और सभी रैंकों की पदोन्नति की संभावनाओं के साथ-साथ सेवा प्रमुख, सीडीएस और रक्षा सचिव के कर्तव्यों और भूमिका को नया स्वरूप देने जैसे परिवर्तनकारी सुधार सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं और सशस्त्र बलों की व्यवस्था तथा संचालन  से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं . राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास सुनिश्चित करने के लिए भविष्य में हमारे रक्षा तंत्र की निर्बाध कार्यप्रणाली और तालमेल का होना नितांत आवश्यक है. इन सुधारों को लागू करने से पूर्व पूर्ण विवेचना अत्यंत आवश्यक है.इसलिए केवल रक्षा मंत्रालय और सीडीएस के स्तर पर इस अति महत्वपूर्ण कार्य को अंतिम रूप देने के बजाय सभी हितधारकों के बीच बहुत व्यापक और समग्र विचार-विमर्श और सर्वसम्मति की आवश्यकता है. इसी संदर्भ  में  तीनों सेनाओं के प्रमुखों के अलावा  सैन्य सलाहकारों, सेवानिवृत्त सेना अधिकारियों ,विशेषज्ञों द्वारा की गई अनुसंशा के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर चर्चा के लिए संसदीय समिति का गठन नितांत आवश्यक है तथा पूर्ण निर्णय के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े  इस अतिसंवेदशील मुद्धे पर  संसद में विस्तृत विचार-विमर्श और अनुमोदन अतिआवश्यक है.


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