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विज्ञान एवं रक्षा तकनीकि

"हमारे देश में रक्षा व्यय को एक भारी भरकम व्यय समझने की भ्रांति विकसित हो रही है"
"देश की सामरिक परिस्थितियों के हिसाब से हमारे सैन्य बलों में अधिक कटौती की गुंजाइश नहीं"

मेजर जनरल जे.के.एस. परिहार (सेवा निवृत)

रक्षा ,सामरिक एवं अंतराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ

नई दिल्ली, 1 फरवरी 2021

वित्तीय वर्ष 2021-22 का  रक्षा बजट कॉरोना संकटकाल जनित आर्थिक संकटों में आशा के अनुरूप ही रहा है.पिछले वित्तीय वर्ष के ₹4,89343 करोड़ के मुक़ाबले 1% कम ₹4,84,019 करोड़ (69बिलियन $ ) आवंटित किए गये हैं .रक्षा बजट में केपिटल हेड में  1,35060 करोड़ तथा 2,12027 करोड़, राजस्व खाते में राजस्वएवं वेतन तथा 1,25000 करोड़ रुपये पेंशन इत्यादि के लिए आवंटित किए गए हैं. पेंशन बजट  में पिछले वर्ष के मुक़ाबले 8825 करोड़ की कटोती हुई है.


सांकेतिक तस्वीर।

केपिटल हेड के अंतर्गत हुए आवंटन में थल सेना को 36,481करोड़ ,वायु सेना को 55055 करोड़ तथा नौसेना को 33253 करोड़ आधुनिकरण , उपकरणों के बदलाव इत्यादि के लिए आवंटित हैं. हालांकि केपिटल आवंटन तीनों सेनाओं के आधुनिकरण और आवश्यकताओं से करीब 30% कम है. राजस्व खाते में थल सेना को 1,48818 करोड़,वायु सेना को 30652 करोड़ तथा नौसेना को 23360 करोड़ आवंटित किए गए हैं. रक्षा बजट में रिसर्च फंड में 50% वृद्धि  के साथ 11375 करोड़ का आवंटन प्रशंसनीय है.

यद्यपि चीन की अतिक्रमण और विस्तारवादी और पाकिस्तान की भारत के विरुद्ध बढ़ती गतिविधियों से मुकाबला करने के लिए अधिक संसाधनों की आपूर्ति हेतु रक्षा बजट के केपिटल हेड अपेक्षित वृद्धि नहीं होना निराशाजनक है. हमारा कुल रक्षा बजट जीडीपी का 1.95   प्रतिशत और सरकार के कुल व्ययबजट का 15.49 प्रतिशत है, यह अनुपात पिछले कुछ वर्षों से तकरीबन स्थिर ही रहा है. भारत का रक्षा व्यय विश्व स्तर पर  अमेरिका ,चीन और रूस के बाद चतुर्थ स्थान पर है, परन्तु जहां अमेरिका का रक्षा व्यय 717 बिलियन   डॉलर , चीन 250,रूस 76.4,जर्मनी 53, दक्षिण कोरिया 42 एवं सऊदी अरब 51 बिलियन डॉलर है, भारत का कुल रक्षा बजट 69 बिलियन डॉलर ही है जो कि आवश्यकता से  बहुत कम है.


सांकेतिक तस्वीर।

इसी प्रकार विभिन्न देश रक्षा बजट के आकलन में अलग अलग मापदंड अपनाते हैं और वास्तविक व्यय तथा घोषितव्यय में पारदर्शिता का अभाव रहता है,अधिकतर देश रक्षा उपकरणों के क्रय  तथा इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को ही रक्षा बजट मानते हैं तथा वेतन तथा पेंशन ,राजस्व खर्च को अलग रखते हैं. इस तथ्य के वावजूद भारत का कुल रक्षा व्यय जीडीपी के 1.95  प्रतिशत के आधार पर अन्य देशों से काफी कम है  जहां सऊदी अरब 8 % तथा अन्य देश   3 से 4.5 % तक सुरक्षा पर व्यय करते है. एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अमेरिका ,रूस ,फ्रांस ,इंग्लैंड इत्यादि देशों का रक्षा व्यय उनकी भौगोलिक सीमाओं की रक्षा हेतु कम तथा मुख्यतया उनकी अंतरराष्ट्रीय सामरिक महाशक्ति की आकांक्षा और भूमिका पर आधारित है, इसी प्रकार चीन का भारी भरकम रक्षा व्यय उसकी विस्तारवादी , अतिक्रमणवादी खासकर भारत और दक्षिण एशियाई देशों के खिलाफ है, जबकि पाकिस्तान का पूरा रक्षातंत्र भारत के खिलाफ परोक्ष अथवा अपरोक्ष युद्ध तंत्र के रूप में ही है.


सांकेतिक तस्वीर।

इसके विपरीत भारत  का रक्षा तंत्र ना केवल चीन और पाकिस्तान के बढ़ते खतरों के मुकाबले अपनी भौगोलिक सीमाओं की रक्षा के किए आवश्यक है अपितु अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में हमारे जल क्षेत्रों तथा भारत की बढ़ती वैश्विक जिम्मेदारी के अनुरूप एक चुस्त दुरुस्त और एक अति आधुनिक सैन्यतंत्र के रूप में  अगले 30 वर्षों में ना केवल थल ,नभ और जल बल्कि अंतरिक्ष ,साइबर इत्यादि में होने वाली तमाम रक्षा सम्बंधित चुनौतियों का सफलता पूर्वक सामना करने में सक्षम हों.

दुर्भाग्यवश हमारे देश में रक्षा व्यय को एक भारी भरकम व्यय समझने की भ्रांति विकसित हो रही है तथा सेना में कटौती की वकालत होती रही है, इस भ्रांति को  जितना जल्दी दूर रखा जाए अच्छा है. वैसे भी भारत की भौगोलिक और सामरिक परिस्थितियों के हिसाब से हमारे सैन्य बलों में अधिक कटौती की गुंजाइश नहीं है अपितु सेना तंत्रों में आंतरिक बदलाव संभव है और उसके लिए भी बजट आवंटन की आवश्यकता पड़ेगी.
यद्यपि वर्तमान सरकार सुरक्षातंत्र को अधिक सक्षम और आधुनिकरण के प्रति काफी गंभीर और संवेदन शील है ,फिर भी गत एक वर्ष में चीन और पाकिस्तान की हमारे खिलाफ बढ़ती हुई आक्रामक गतिविधियों और भविष्य की चुनौतियों  के भलीभांति मुकाबला करने के लिए रक्षा व्यय को तर्कसंगत और विश्व के अन्य प्रमुख देशों के अनुरूप रखना अतिआवश्यक है.


सांकेतिक तस्वीर।

इस क्षेत्र में पहला कदम आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत स्वदेशी संसाधनों का विकास प्रशंसनीय है.दूसरा महत्वपूर्ण कदम  बजट आवंटन की प्रक्रिया में केपिटल हेड में रक्षा व्यय को एक समय बद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत जीडीपी के तीन प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए.इसी प्रकार राजस्व और वेतन एवम् पेंशन इत्यादि व्यय तत्कालीन आवश्यकता के अनुरूप अलग से आवंटित किया जाना चाहिए.


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