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दिल्ली में बुद्धिज्म और सूफी पर साहित्य प्रेमियों का जमावड़ा

आकाश श्रीवास्तव

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

नई दिल्ली, २३ फरवरी २०१९

नई दिल्ली। साहित्य अकादेमी के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 22-24 फरवरी 2019 को ‘साउथ एशियन फेस्टिवल ऑफ़ सूफ़ीज़्म एंड बुद्धिज़्म’ का आरंभ हुआ। इस कार्यक्रम का उद्घाटन साहित्य अकादेमी के प्रथम तल स्थित सभागार में 22 फरवरी को पूर्वाह्न 10.30 बजे हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने सभी अतिथियों का अंगवस्त्रम् और पुस्तकें भेंट कर स्वागत किया। अपने स्वागत वक्तव्य में उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि आज के अशांत विश्व में शांति और सौहार्द- सूफ़ीज़्म एंड बुद्धिज़्म जिसके पर्याय हैं - को स्थापित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत बहुसांस्कृतिक और विभिन्न धर्म, संप्रदाय तथा दर्शनों की भूमि है जिनमें आंतरिक एकता का सूत्र पिरोया हुआ है।


ये संस्कृतियाँ और दर्शन शास्त्र के विभिन्न विभाग एक दूसरे से मतभेद भी रखते हैं किंतु एक दूसरे के पूरक भी हैं और एक दूसरे को समृद्ध भी करते हैं; क्योंकि इनकी आंतरिकता में मनुष्यता और सोद्देश्यता का गुण है। उन्होंने आगे कहा कि दो महान दर्शन-परंपराओं-- सूफ़ीज़्म एंड बुद्धिज़्म के बीच विभिन्न विरोधाभास के बावजूद बहुत सारी समानताएँ हैं। हमें विश्वास है कि यह आयोजन वैश्विक शांति, सद्भाव और प्रेम को बढ़ावा देने में रचनात्मक सहयोग करेगा। थ्व्ैॅ।स् की अध्यक्ष और प्रख्यात कवयित्री अजीत कौर ने अपने आरंभिक वक्तव्य में बताया कि यह इस प्रकार के आयोजन का 56वाँ संस्करण है। उन्होंने सबसे पहले दिवंगत प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह का स्मरण किया और उनके सहयोगी व्यक्तित्व की चर्चा की। उन्होंने इस आयोजन के उद्देश्य को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि सूफ़ीज़्म और बुद्धिज़्म दोनों ही दर्शनों का लक्ष्य ‘परम तत्त्व’ और उसके ’सत्त्व’ को जानना और उसे प्राप्त करना रहा है।

उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया हिंसा, आतंकवाद, अलगाव और सांप्रदायिक वैमनष्य से जूझ रही है। ऐसे दौर में यह आवश्यक हो जाता है कि मानवीय आदर्श मूल्यों और सृजनात्मक और लोकतांत्रिक विचार-परंपराओं की ओर जाया जाए। भक्ति आंदोलन ने सर्व-समावेशी और सर्व-हितैषी जिस वृहद् समभाव की उदारता को प्रस्तुत किया था, उसी तत्त्व और भाव को सूफ़ीज़्म और बुद्धिज़्म ने अपनी तरह से प्रस्तुत किया और सार्वभौमिक प्रेम तथा एकता की स्थापना के लिए प्रयास किया। यह आयोजन उसी तत्त्व और भाव को प्रस्तुत करने के लिए किया जा रहा है।


साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष और प्रख्यात कवि माधव कौशिक ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि जब समाज विषम स्थितियों में रहा है और लगभग विघटन के कगार पर खड़ा रहा है तब महापुरुषों ने जन्म लेकर शांति समता, सद्भाव का संदेश देकर मनुष्य की जीवन-पद्धति को बदल दिया। गौतम बुद्ध का जन्म ऐसी ही महत्त्वपूर्ण सुघटना है। उन्होंने एडविन अर्नाल्ड को उदृत करते हुए कहा कि उन्होंने बुद्ध को ’लाइट ऑफ एशिया’ कहा था। उन्होंने कहा कि क्राइस्ट के बाद दुनिया में सबसे अधिक मूर्तियाँ बुद्ध की हैं। इससे यह साबित होता है कि उनके दर्शन ने कलाओं और जन-जीवन के कितना व्यापक रूप से प्रभावित किया है। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री के रूप में दिए गए अभिभाषण की अंतिम पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा कि जिस देश के नागरिक सांप्रदायिक और संकीर्ण विचारों के होंगे वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता। सूफ़ी संतों की वाणियों को लोग जीवन के संविधान की तरह उपयोग करते हैं। मैं सूफ़ीज़्म को ‘माइट ऑफ एशिया’ कहना चाहता हूँ। सूफ़ीज़्म और बुद्धिज़्म ने मनुष्य की सोच को सहज और सहिष्णु बनाया। उन्होंने कहा कि इस उत्सव में हम ‘लाइट’ और माइट एशिया’ को ’डिस्कवर’ कर सकते हैं।


काउंसिल फॉर सोशल डेवलप्मेंट के अध्यक्ष मुचकंुद दुबे ने अपने बीज वक्तव्य में सूफ़ीज़्म और बुद्धिज़्म की आंतरिक सूक्ष्मता को उदाहरण सहित व्याख्यायित किया और कहा कि सूफ़ीज़्म ने संगीत की उस शक्ति का उपयोग किया जिसका सार्थक उपयोग भक्तों और संतों ने किया था। प्रख्यात विद्वान आशीष नंदी ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि मध्यकाल ‘डार्क फेज़’ माना जाता है लेकिन मेरा मानना है कि यूरोपीय मध्यकाल अंधकार का युग है जबकि भारतीय सभ्यता के लिए मध्यकाल स्वर्णयुग है। उन्होंने कहा ’स्वयं’ की, ’आत्म’ की, अपने ‘स्व’ की खोज ही सृजनात्मकता और आध्यात्मिकता की उपलब्धि होती है। आज के समय में जो धर्म मनुष्य की आंतरिक ज़रूरत को पूरा करेगा उसी का अनुसरण होगा और वही बचेगा।

प्रख्यात दार्शनिक अख़्तरुल वासे ने इस्लाम के ‘तसव्वुफ़’ और सूफ़ीज़्म के विभिन्न सिलसिलों का ज़िक्र करते हुए सूफ़ी संप्रदाय की बारीकियों और जीवन में उनके प्रभावों को व्याख्यायित किया। प्रख्यात विद्वान के.टी.एस. साराव ने ’एप्लिकेशन पार्ट ऑफ़ बुद्धिज़्म इन कंटेम्परेरी टाइम’ विषय पर अपना बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने वैश्विक समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया और उनका समाधान सूफ़ीज़्म और बुद्धिज़्म में माना। उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म का मूल सूत्र ही ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ है। यदि मनुष्य में मानवीय मूल्य आ जाते हैं तो विश्व की सभी समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।


भारत में अफ़गानिस्तान दूतावास के सांस्कृतिक समन्वयक अजमल अलीमज़ई ने अपने विशेष वक्तव्य में सूफ़ीज़्म और बुद्धिज़्म के उद्भव और विकास का ज़िक्र किया और कहा कि आज यह ज़रूरी हो गया है कि प्राचीन धर्मों, संस्कृति एवं सभ्यताओं के आदर्शों और संदेशों को अपनाया जाए जिससे कि दुनिया शांतिपूर्ण हो सके। प्रख्यात विद्वान आनंद कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज के इस संक्रमण काल में सिर्फ़ ‘ह्यूमिनिज़्म’ की ही ज़रूरत है।

इसके बाद कविता-पाठ  का पहला सत्र अपराह्न 2.30 बजे आयोजित हुआ जिसमें अहमद जावेद (अफ़गानिस्तान), अल मामून महबूब आलम (बाङ्लादेश), चादोर वांगमू (भूटान) और ए.जे. थॉमस (भारत) ने अपनी कविताएँ प्रस्तुत कीं और इस सत्र की अध्यक्षता अभी सुबेदी (नेपाल) ने की। अपराह्न 3.30 बजे आयोजित सत्र में सामंथ इलांगकून (श्रीलंका), अहमद फ़ैयाज़ अमीरी (अफ़गानिस्तान) ने अपने आलेख प्रस्तुत किए और इस सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात कश्मीरी लेखक अज़ीज़ हाजिनी (भारत) ने की। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद रहे। कल भी यह आयोजन जारी रहेगा।


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