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सर्वोच्च न्यायालय के जजों ने ही सर्वोच्च न्यायालय के कार्यशैली पर उठाया सवाल!
चार जजों ने मीडिया को बतायी अपनी वेदना, देश में उठा भूचाल!

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

नई दिल्ली

देश के सर्वोच्च न्यायालय और आजाद भारत के इतिहास में पहली बार  सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ चार न्यायाधीशों ने शुक्रवार को मीडिया के सामने आकर बगावती तेवर दिखाकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठा कर भूचाल ला दिया है। दिल्ली में एक  संवाददाता सम्मेलन में उच्चतम न्यायालय के  चार न्यायाधीशों ने एक चिट्ठी जारी की, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासकीय संचालन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जजों के मुताबिक यह चिट्ठी उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को लिखी थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित 7 पन्नों के पत्र में जजों ने कुछ मामलों के असाइनमेंट को लेकर नाराजगी जताई है। न्यायाधीशों का आरोप है कि मुख्य न्यायाधीश की ओर से कुछ मामलों को चुनिंदा बेंचों और जजों को ही दिया जा रहा है।


सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीश मीडिया के सामने अपनी वेदना कहते हुए।

संवाददाता सम्मेलन में जजों ने कहा कि हमें घोर दुख और चिंता है इसलिए लेटर लिखा है। चारों जजों ने कहा कि आज सर्वोच्च न्यायालय के कार्यशैली से लोकतंत्र खतरे में है चारों जजों ने कहा कि यही कारण है कि मीडिया के सामने हमें आना पड़ा। जजों ने कहा कि ये सही होगा कि आपको लेटर के जरिये मामले को बताया जाय। हाल में जो आदेश पारित किये उससे न्याय प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ा है साथ ही सीजेआई के आफिस और हाई कोर्ट के प्रशासन पर सवाल उठा है।  यह जरूरी है कि उक्त सिद्धान्त का पालन हो और सीजेआई पर भी वह लागू है। सीजेआई खुद ही उन मामलों में अथॉरिटी के तौर पर आदेश नही दे सकती, जिन्हें किसी और उपयुक्त बेंच ने सुना हो चाहे जजों की गिनती के हिसाब से ही क्यों न हो। उक्त सिद्धान्त की अवहेलना अनुचित, अवांछित और अशोभनीय है। इससे कोर्ट की गरिमा पर संदेह उत्पन्न होता है। उन्होंने कहा, "सर्वोच्च न्यायालय की प्रशासन ठीक से काम नहीं कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में ऐसा बहुत कुछ हुआ है, जो नहीं होना चाहिए था। देश और संस्थान के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। हमने प्रधान न्यायाधीश को संयुक्त रूप से समझाने की कोशिश की कि कुछ चीजें ठीक नहीं हैं और तत्काल उपचार की आवश्यकता है।" न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने कहा, "दुर्भाग्यवश इस संस्थान को बचाने के कदम उठाने के लिए भारत के प्रधान न्यायाधीश को राजी करने की हमारी कोशिश विफल साबित हुई है।"

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति मदन बी.लोकुर की मौजूदगी में न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने कहा कि हम चारों इस बात से सहमत हैं कि "लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए निष्पक्ष न्यायाधीश और न्याय प्रणाली की जरूरत है।" उन्होंने कहा, "हम चारों इस बात से सहमत हैं कि जबतक इस संस्थान को इसकी आवश्यकताओं के अनुरूप बचाया और बनाए नहीं रखा जाएगा, इस देश का लोकतंत्र या किसी भी देश का लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता। किसी लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए, ऐसा कहा गया है.. किसी लोकतंत्र की कसौटी स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायाधीश होते हैं।"


न्यायमूर्ति चेलेमेश्वर ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि वे लोग किस चीज से नाराज हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि मीडिया में बहुत सारी चीजें लिखी जा चुकी हैं और यह कोई राजनीति विवाद नहीं है। उन्होंने कहा, "चूंकि हमारे सभी प्रयास विफल हो गए..यहां तक कि आज सुबह भी एक खास मुद्दे पर हम चारों एक खास अनुरोध के लिए प्रधान न्यायाधीश से मुलाकात करने गए। दुर्भाग्यवश हम उन्हें नहीं समझा नहीं सके। इसके बाद इस संस्थान बचाने का इस देश से आग्रह करने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं रह गया।"


उन्होंने कहा, "हमने ढेर सारे बुद्धिमानों को इस बारे में बातें करते सुना है..लेकिन मैं नहीं चाहता कि कुछ बुद्धिमान आज के 20 वर्ष बाद हमसे भी कहें कि हम चारों न्यायाधीशों ने संस्थान और देश की हिफाजत करने के बदले अपनी आत्मा को बेच दिया। हमने इसे जनता के समक्ष रख दिया है। हम यही कहना चाहते थे।" आखिर वास्तव में मुद्दा क्या है? न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने कहा, "कुछ महीने पहले, हम चारों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रधान न्यायाधीश को एक हस्ताक्षरित पत्र लिखा था। हम एक विशेष चीज के बारे में चाहते थे कि उसे विशेष तरीके से किया जाए। लेकिन कुछ हुआ नहीं। न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा वे लोग "देश के प्रति अपना कर्ज उतार रहे हैं।" साथ में समाचार एजेंसी साभार।



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