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... दुनिया के एक अरब से ज्यादा लोगों के सामने भोजन और पानी का संकट..!

आकाश श्रीवास्तव

नई दिल्ली

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

भारत में दिल्ली से सटे ग्रेटरनोएडा में सोमवार से शुरू हुई संयुक्त राष्ट्र की कॉप-14 की बैठक में चिंता जतायी गयी है कि सदी के अंत तक यदि तापमान में दो डिग्री की बढ़ोतरी होती है तो शुष्क भूमि पर बसे 115.2 करोड़ लोगों के लिए जल, जमीन और भोजन का संकट पैदा हो जाएगा। आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार यह खतरा कुछ दशकों से तेजी से बढ़ रहा है। क्योंकि 2007 में ऐसे लोगों की संख्या 25 करोड़ होने का अनुमान व्यक्त किया गया था। जबकि 2015 में करीब 50 करोड़ लोगों के खतरे में होने का आकलन है। अब सदी के अंत तक यह संख्या दोगुनी से भी ज्यादा होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।


यदि वैश्विक प्रयास तापमान बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री तक सीमित रखने में सफल रहे तो भी 96.1 करोड़ लोगों के लिए यह खतरा बरकरार रहेगा। यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण है क्योंकि बैठक का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से भूमि को बंजर होने से बचाने के उपाय खोजना है। दरअसल, विश्व में करीब 40 फीसदी शुष्क भूमि है। जिसमें करीब छह फीसदी घोषित मरुस्थल को छोड़ दिया जाए तो बाकी 34 फीसदी भूमि पर करीब चार अरब लोग निर्भर हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों जिसमें सूखा, एकाएक ज्यादा बारिश, बाढ़, खारापान, रेतीली हवाएं चलना आदि शामिल हैं, के चलते बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। भारत में करीब 69 फीसदी शुष्क भूमि बंजर होने के खतरे का सामना कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार आबादी के जिस बड़े समूह पर यह खतरा मंडरा रहा है, उसमें करीब आधी आबादी एशिया में है। भारत में गंगा बेसिन को सबसे ज्यादा संवेदनशील बताया गया है। जबकि पाकिस्तान में सिंधु बेसिन, चीन में यलो रीवर और यिनचुंग प्लेन से हरियाली गायब होने का उल्लेख है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते भूमि का क्षरण 10-20 गुना तक बढ़ गया है। यह  भूमि के निर्माण की तुलना में सौ गुना ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार 1961-2013 के बीच भारत समेत पूरे विश्व में शुष्क भूमि प्रतिवर्ष एक फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है। लेकिन आगे यह खतरा ज्यादा तीव्र होने का अनुमान है।

एशिया के बाहर के देशों में भी शुष्क भूमि के बंजर होने का खतरा तेजी से बढ़ा है। उत्तरी अमेरिका में 60 फीसदी, ग्रीक, पुर्तगाल, इटली और फ्रांस में 16-62 फीसदी, उत्तरी भूमध्यसागरीय देशों में 33.8 फीसदी, स्पेन में 69, साइप्रस में 66 फीसदी जमीन शुष्क भूमि पर बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। जबकि अफ्रीका के 54 में से 46 देश बुरी तरह से इसकी जद में हैं।


कॉप-14 का प्रमुख कार्य उन रिपोर्टों की समीक्षा करना है, जो सदस्य देश अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए बैठक के दौरान रखते हैं। इस सम्मेलन में राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, स्थानीय निकाय, विज्ञान और अनुसंधान क्षेत्र, निजी क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवी संगठन व मीडिया प्रतिनिधि भाग लेंगे। हर साल जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है।


मुख्य उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना है। यह समझौता जून 1992 के पृथ्वी सम्मेलन में हुआ था। समझौते पर कई देशों के हस्ताक्षर के बाद 21 मार्च 1994 को इसे लागू किया गया था। यूएनएफसीसीसी की वार्षिक बैठक का आयोजन साल 1995 से हो रहा है।



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