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सेहत की बातें

दिल की बीमारियों की ये हैं निशानियां और इनसे ऐसे बचें, और बर्तें सावधानियां!

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़ नई दिल्ली

२५ फरवरी २०१८

दिल की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। युवाओं में हार्ट अटैक के मामले पिछले 15 साल में 100 फीसदी बढ़ गए हैं। ऐसे में दिल को दुरुस्त रखने के लिए एहतियात बरतना जरूरी है। हार्ट से जुड़ी बीमारियों और उनके इलाज के बारे में एक्सपर्ट्स से बात करके पूरी जानकारी दे रही हैं प्रियंका सिंह


एक्सपर्ट्स पैनल
डॉ. अशोक सेठ, चेयरमैन, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट
डॉ. के. के. अग्रवाल, प्रेजिडंट, हार्ट केयर फाउंडेशन
डॉ. संदीप मिश्रा, प्रफेसर, कार्डियॉलजी, एम्स
डॉ. अनिल मिनोचा, हेड, नॉन-इनवेसिव कार्डियॉलजी, फोर्टिस
डॉ. मयंक गोयल, असिस्टेंट प्रफेसर, कार्डियॉलजी, राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल
डॉ. अंजुल जैन, कंसल्टंट कार्डियॉलजिस्ट

मोहनीश की उम्र 38 साल थी। वह रोजाना एक्सरसाइज करते थे और डाइट का भी ख्याल रखते थे। एक दिन अचानक बैडमिंटन खेलते-खेलते मोहनीश जमीन पर गिर पड़े। आसपास मौजूद लोगों ने उन्हें संभालने की कोशिश की लेकिन तब तक मोहनीश की जान जा चुकी थी। बाद में डॉक्टर ने मोहनीश की मौत की वजह कार्डिएक अरेस्ट को बताया। 51 साल के नरेश को एक दिन ऑफिस में बैठे-बैठे अचानक सीने में तेज दर्द हुआ। उनके पास में बैठे सहयोगी ने फटाफट उन्हें एस्प्रिन को गोली पानी में घोलकर पिलाई और फौरन पास में मौजूद क्लिनिक ले गए। डॉक्टर ने चेकअप किया तो पता लगा कि नरेश की दो आर्टरीज़ 70 फीसदी तक ब्लॉक हो चुकी हैं, जिस वजह से उन्हें हार्ट अटैक हुआ था। सहयोगी की समझ और सही वक्त पर इलाज मिलने से नरेश की जान बच गई।


ये मामले इस बात का संकेत हैं कि हार्ट की प्रॉब्लम से जुड़े मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अक्सर लोग सही वक्त पर इसे लेकर सचेत नहीं होते इसलिए बीमारी बढ़ती जाती है जैसे कि हाई ब्लड प्रेशर के ज्यादातर मरीज यह सोचकर चलते हैं कि यह कॉमन-सी बात है लेकिन कई बार आगे जाकर हाई बीपी भी हार्ट फेल्योर की वजह बन सकता है क्योंकि धीरे-धीरे इससे दिल की नसें कमजोर होने लगती हैं। हालांकि अगर हाई बीपी नहीं हो लेकिन दूसरे रिस्क फैक्टर (फैमिली हिस्ट्री, कॉलेस्ट्रोल, मोटापा, डायबीटीज आदि ) हों तो भी हार्ट फेल्योर के चांस बढ़ जाते हैं।


हार्ट संबंधी बीमारियां
दिल से जुड़ी मेन बीमारियां हैं: एंजाइना, हार्ट अटैक, कार्डिएक अरेस्ट और हार्ट फेल्योर। बीमारी की गंभीरता के लिहाज से देखें तो ये चारों अलग हैं लेकिन ज्यादातर के लक्षण करीब-करीब एक जैसे ही होते हैं। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि अगर आप गाड़ी चला रहे हैं और ट्रैफिक में फंसकर गाड़ी रुक-रुक कर चल रही है, तो उसे एंजाइना मान सकते हैं। अगर इंजन चल रहा है लेकिन गाड़ी रुक गई है तो हार्ट अटैक होगा। अगर गाड़ी और इंजन, दोनों बंद हो गए हैं तो कार्डिएक अरेस्ट कह सकते हैं। अगर इंजन को हो रहे नुकसान को वक्त पर ठीक नहीं कराया और धीरे-धीरे वह बेकार हो जाए तो इसे हार्ट फेल्योर कहा जा सकता है।

दर्द से कैसे पहचानें बीमारी
आमतौर पर दर्द के अनुसार बीमारी को पहचानना मुश्किल है लेकिन फिर भी मोटा-मोटा अनुमान लगाया जा सकता है:


एसिडिटी
- एसिडिटी का दर्द सीने में एक खास बिंदु पर चुभता महसूस होता है। यह बड़े एरिया में फैला हुआ महसूस नहीं होता।
क्या करें
- 2-3 चम्मच एंटासिड (Antacid) ले लें। ये मार्केट में डाइजीन (Digene), म्यूकेन जेल (Mucaine Gel), एसिडिन जेल (Acidin Gel) आदि ब्रैंड नेम से मिलते हैं। अगर घंटे भर में दर्द इससे ठीक न हो और बढ़ता जाए तो एंजाइना या हार्ट अटैक का दर्द हो सकता है।

एंजाइना
- अगर छाती के बीच में भारी दबाव महसूस हो, घबराहट हो, सांस रुकी-सी लगे, दर्द जबड़े की ओर जाए बढ़ता लगे, छोटा-मोटा काम (नहाने और खाने जैसे काम करने पर भी) करने पर भी दिल में दर्द महसूस हो और आराम करने पर दर्द बंद हो जाए तो एंजाइना हो सकता है।
- यह दर्द गुस्सा करने, मेहनत का काम करने, सीढ़ियां चढ़ने या चलने-फिरने पर बढ़ जाता है। थोड़ी देर आराम करने पर यह दर्द ठीक हो जाता है।
- अगर करीब 20 मिनट आराम करने के बाद भी दर्द कम न हो और घबराहट बनी रहे, पसीना आता रहे तो हार्ट अटैक का दर्द हो सकता है।
क्या करें
- मरीज आराम से लेट जाए। गुस्सा न करें, न ही परेशान हों।
- इस दर्द से फौरन मरीज को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन यह दिल में किसी गड़बड़ी का इशारा है। दर्द बार-बार हो तो डॉक्टर के पास जाकर ईसीजी करा लें।
- जब दर्द हो तो ग्लाइसिरल ट्राइनाइट्रेट (Glyceryl Trinitrate) वाली 5 एमजी की गोली जीभ के नीचे रख लें। यह मार्केट में सॉरबिट्रेट (Sorbitrate) और आइसोर्डिल (Isordil) आदि ब्रैंड नेम नाम से मिलती है। इससे नस का साइज बढ़ जाता है और पूरा ब्लड पहुंच जाता है। यह फौरी राहत के लिए है। इसके बाद डॉक्टर को जाकर मिलें।
- इसके अलावा हार्ट रेट या ब्लड प्रेशर कम करने वाली दवाएं देते हैं। ब्लड प्रेशर कम होने से हार्ट के काम करने की रफ्तार कुछ कम हो जाती है।

हार्ट अटैक
- अगर सीने के बीचोंबीच तेज दर्द हो, दर्द लेफ्ट बाजू की ओर बढ़ता महसूस हो, सीने पर पत्थर जैसा दबाव महसूस हो, काफी घबराहट/बेचैनी हो, पसीना आए, लगे कि किसी ने दिल को जकड़ लिया है और दर्द कम होने के बजाय बढ़ता जाए तो हार्ट अटैक की आशंका होती है।
- अगर आपके हार्ट की धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल जमा होने से कुछ ब्लॉकेज है लेकिन अचानक से वह फट जाए और नली को ब्लॉक कर दे तो हार्ट अटैक होता है। करीब 30 फीसदी लोगों में दर्द के अलावा हार्ट अटैक के बाकी लक्षण नजर नहीं आते।
- मरीज को फौरन 300 मिग्रा की एस्प्रिन (Asprin) पानी के साथ दें। यह मार्केट में डिस्प्रिन (Disprin), एस्प्रिन (Easprin), इकोट्रिन (Ecotrin) आदि ब्रैंड नेम से मिलती है। यह आर्टरी को ब्लॉक होने और खून के धक्के जमने से रोकती है लेकिन अल्सर या डेंगू के मरीज डॉक्टर से बिना पूछे इसे न लें।
- दिल के मरीज हैं तो सॉर्बिट्रेट या आइसोर्डिल भी ले सकते हैं। लेकिन अगर पहली बार इसे ले रहे हैं तो ब्लड प्रेशर अचानक काफी कम हो सकता है। इससे बेहतर एस्प्रिन लेना ही है क्योंकि वह सभी के लिए सेफ है। हां, एस्प्रिन न हो तो सॉर्बिट्रेट भी ले सकते हैं।
- इसके बाद बिना देर किए मरीज को कैथ लैब वाले अस्पताल ले जाएं। अगर दो घंटे में वहां पहुंचा मुमकिन नहीं है तो ऐसे किसी भी अस्पताल में ले जाएं, जहां मरीज को खून पतला करने वाली दवा दी जा सके। अटैक के पहले 3 घंटों में इलाज हो जाए तो ज्यादातर मरीजों को बचाया जा सकता है।

क्या करें
- आर्टरी के ब्लॉकेज को खोलने के लिए डॉक्टर सबसे पहले मरीज को क्लॉट बस्टर जैसे कि स्ट्रेपटोकायनेस (Streptokinase) या टेनेक्टेप्लेस (Tenecteplase) देते हैं।
- इसके बाद एंजियोप्लास्टी करके स्टेंट डाल देते हैं ताकि आर्टरी की रुकावट खुल जाए।
- हार्ट अटैक में गोल्डन आवर (घंटे) का नियम काम करता है। अगर एक घंटे में इलाज मिल जाए तो दिल की मांसपेशियों को नुकसान नहीं होता। अगर 12 घंटे बिना इलाज के निकल जाएं तो मसल्स पूरी तरह डैमेज हो जाती हैं और उनकी रिकवरी नहीं हो सकती।

कार्डिएक अरेस्ट
- कोई शख्स बिल्कुल ठीकठाक है और अचानक उसका बीपी एकदम नीचे (ऊपर वाला बीपी 90 तक) गिर जाए, शरीर पीला पड़ जाए, वह लड़खड़ाकर जमीन पर गिर जाए और उसकी धड़कन बहुत तेज या अनियमित होकर एकदम थम जाए तो इसे कार्डिएक अरेस्ट कहा जाएगा। कार्डिएक अरेस्ट अचानक मौत की सबसे बड़ी वजहों में से है।
- जिनको पहले हार्ट अटैक हो चुका हो, दिल की बीमारी की फैमिली हिस्ट्री हो, डायबीटीज हो या स्मोकिंग भी करते हों तो कार्डिएक अरेस्ट का खतरा बढ़ जाता है।
- अगर सांस/धड़कन रुकने के पहले 10 मिनट में सही इलाज मिल जाए तो बहुत सारे मरीजों को बचाया जा सकता है। ध्यान रखें, इलाज जितना जल्दी हो, उतना बेहतर है क्योंकि हर एक मिनट में करीब 10 फीसदी चांस कम हो जाते हैं।
क्या करें
- अगर अस्पताल में किसी को कार्डिएक अरेस्ट होता है तो डॉक्टर एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट, शॉक, वेंटिलेटर आदि के जरिए 80 फीसदी तक मरीजों को बचा सकते हैं।
- कार्डिएक अरेस्ट के पहले 4 मिनट में अगर डॉक्टरी मदद मिल जाए तो पहले इलेक्ट्रिक शॉक मशीन से शॉक दिया जाता है और फिर चेस्ट कॉम्प्रेशन (सीपीआर) किया जाता है। अगर मदद अगले 5-10 मिनट में मिलती है तो पहले सीपीआर और फिर इलेक्ट्रिक शॉक मशीन का इस्तेमाल करना बेहतर है।
- अगर फौरन डॉक्टरी मदद मुमकिन नहीं है तो मरीज को आराम से जमीन पर लिटा दें। गर्दन को हल्का खींच कर सिर को थोड़ा ऊपर कर लें ताकि जीभ अंदर न गिरे। मरीज को हवा आने दें।
- इसके बाद मरीज के सीने के बीचोंबीच जोर से एक मुक्का मारें। इसे कार्डिएक थंप कहा जाता है। फिर फौरन CPR शुरू करें।
कैसे करें CPR
- मरीज के पास घुटनों के बल बैठ जाएं और अपना दायां हाथ मरीज के सीने पर रखें। इसके ऊपर दूसरा हाथ रखें और उंगलियों को आपस में फंसा लें।
- अपनी हथेलियों की मदद से अगले 10 मिनट के लिए सीने के बीच वाले हिस्से को जोर से दबाएं।
- एक मिनट में 80 से 100 की रफ्तार से बार-बार दबाएं, यानी 60 सेकंड में 100 बार सीने को दबाएं।
- ध्यान रखें कि जोर से दबाएं और तेज-तेज दबाएं। हर बार दबाते वक्त सीना एक-डेढ़ इंच नीचे जाना चाहिए।
- इसे लगातार करें, जब तक कि डॉक्टरी मदद न मिले। नब्ज देखने के लिए बीच में न रुकें।
नोट: बच्चों में सीपीआर के साथ-साथ मुंह-से-मुंह मिलाकर सांस भी देना चाहिए, बशर्ते मौत की वजह डूबना आदि न हो। बड़ों में मुंह-से-मुंह मिलाकर सांस देने की सलाह नहीं दी जाती। सीपीआर की ट्रेनिंग ज्यादातर सभी बड़े अस्पतालों में दी जाती है। ऐसे में इसे सीख लेना काफी काम का हो सकता है।
CPR सीखने के लिए देखें विडियो: yt.vu/O_49wMpdews

हार्ट फेल्योर
- लंबे समय से अगर दिल की बीमारी है और उसका सही से इलाज नहीं होता तो इससे हार्ट की मसल्स कमजोर हो जाती हैं। यह कमजोरी आगे जाकर हार्ट फेल्योर की वजह बन सकती है। आमतौर पर ब्लड पंप करने की हार्ट की क्षमता 60 फीसदी होती है। अगर वह घटकर 30 फीसदी रह जाए तो हार्ट फेल्योर का खतरा होता है।
- हार्ट अटैक या हार्ट से जुड़ी दूसरी बीमारियां, वायरल इन्फेक्शन, थायरॉयड, डायबीटीज, आर्थराइटिस भी कुछ मामलों में हार्ट फेल्योर की वजह बनता है। इसके अलावा पोटैशियम की कमी और कार्डियोमायोपैथी यानी इन्फेक्शन या शराब या ड्रग्स की वजह से दिल की मसल्स का क्षतिग्रस्त होना भी बड़ी वजह है।
- पैरों में सूजन, धड़कन का तेज होना, चलने के अलावा लेटने और बैठने पर भी सांस फूलना आदि इसके लक्षण हैं क्योंकि जब हार्ट कमजोर हो जाता है तो वह ब्लड आगे की तरफ नहीं भेज पाता। ऐसे में पंप किया ब्लड लंग्स और दूसरे हिस्सों में जाने लगता है।

क्या है इलाज
- इलाज के तौर पर यूरीन पास करने वाली दवाएं यानी डाययूरेटिस जैसे कि फ्यूरोसिमाइड (Furosemide) दी जाती है। यह लैक्सिस (Lasix), टेबमिड (Tebemid), फर्सिमिड (Fursimide) आदि ब्रैंड नेम से मिलती है।
- जरूरत पड़ने पर ऐस इन्हिबिटर (ACE inhibitor) दवा दी जाती है। यह दवा हार्ट के अंदर के प्रेशर को कम करती है।
- इसके अलावा बीटा ब्लॉकर दी जाती हैं। इनमें कई ब्रैंड नेम हैं, जैसे कि एसबुटोलॉल (Acebutolol), एटेनोलॉल (Atenolol), मेटोप्रोलॉल (Metoprolol) आदि। ये दवाएं हार्ट रेट को कम कर लंबे समय में हार्ट की एफिसिशंसी बढ़ाती हैं।
- हार्ट के अंदर के प्रेशर को कम करने और हार्ट को मजबूत करने वाली दवा भी दी जाती है, जिसका जेनरिक नेम है आरनी (Arni) और यह गायमडा (Gymada), टिडमस (Tidmus) आदि ब्रैंड नेम से मिलती है।
- अगर हार्ट की क्षमता 20 फीसदी से कम हो जाए तो LVAD पंप लगाया जाता है। यह एक तरह का आर्टफिशल हार्ट होता है। पंप और सर्जरी, दोनों का खर्च करीब 50-60 लाख रुपये आता है।
- जरूरत पड़ने पर हार्ट ट्रांसप्लांट भी किया जाता है। लेकिन ये मामले काफी कम होते हैं। साल भर में 150-170 हार्ट ट्रांसप्लांट होते हैं।

कौन-से टेस्ट
आमतौर पर डॉक्टर 3 टेस्ट कराते हैं:
1. ट्रोपोनिन टेस्ट (Troponin Test): यह टेस्ट ट्रोपोनिन प्रोटीन का लेवल चेक करता है। यह प्रोटीन हार्ट की मसल्स के डैमेज होने पर निकलता है। कीमत: 1000-1200 रुपये
2. ईसीजी (ECG): यह हार्ट की इलेक्ट्रिकल गतिविधियों के जरिए दिल पर पड़ने वाले प्रेशर को चेक करता है। कीमत: 200-400 रुपये
3. इको कार्डियोग्राम (Eco Cardiogram): यह कार्डिएक अल्ट्रासाउंड होता है। कीमत: 1800-2000 रुपये

क्या कहती है स्टडी
इंटरनैशनल कॉनजेस्टिव हार्ट फेल्योर (Inter-CHF) ने भारत समेत 6 देशों में स्टडी की और पाया कि अपने देश में हार्ट फेल्योर की पहचान होने के एक साल के अंदर ही 23 फीसदी मरीजों की मृत्यु हो गई। दक्षिण पूर्वी एशिया में यह दर 15 फीसदी, दक्षिण अमेरिका में 9 फीसदी, पश्चिमी एशिया में 9 फीसदी और चीन में 7 फीसदी रही। इस रिसर्च के अनुसार एक-तिहाई मरीजों की मृत्यु अस्पताल में दाखिल होने के दौरान हुई है और एक-चौथाई मरीजों की बीमारी की पहचान के तीन महीने के अंदर। पूरी दुनिया में इस वक्त 26 करोड़ लोग हार्ट फेल्योर से पीड़ित हैं। इनमें से 5.4 फीसदी भारत में हैं। 2030 तक इस आंकड़े के 25 फीसदी बढ़ने के आसार हैं। हार्ट फेल्योर की वजहों में धमनियों में ब्लॉकेज, हार्ट अटैक, कार्डियोमायोपैथी हो सकते हैं। इसके अलावा तनाव और बहुत ज्यादा काम करने से भी यह समस्या हो सकती है। दिल को नुकसान पहुंचाने वाली वजहों में डायबीटीज, हाई बीपी, किडनी की बीमारी और थायरॉयड की समस्या हो सकती है। एम्स में कार्डियॉलजी डिपार्टमेंट में प्रफेसर डॉ. संदीप मिश्रा के अनुसार देश में इस समस्या के बढ़ने की वजह है लोगों में जागरुकता की कमी, आर्थिक बोझ और हेल्थकेयर सुविधाओं की कमी। साथ ही जेनेटिक वजहें भी हैं। इससे बचाव के लिए बहुत जरूरी है कि शुरुआती स्टेज में बीमारी का पता लगाया जा सके और मरीज को सही इलाज मिल सके। इस स्टडी में 6 देशों के 108 सेंटरों में 5823 मरीजों को शामिल किया गया।

कैसे पहचानें की दिल फिट है!
अगर आप रोजाना 3 से 4 किमी तेज कदमों से चल सकते हैं और ऐसा करते हुए आपकी सांस नहीं उखड़ती या सीने में दर्द नहीं होता तो मान सकते हैं कि आपका दिल सेहतमंद है। अगर दिल के मरीज हैं और दो मंजिल सीढ़ियां चढ़ने या 2 किमी पैदल चलने के बाद सांस नहीं फूलता तो सामान्य लोगों की तरह एक्सरसाइज कर सकते हैं, वरना डॉक्टर से पूछकर एक्सरसाइज करें।

दिल की बीमारी से बचाव के लिए टेस्ट
40 साल की उम्र में ब्लड प्रेशर (BP) और कॉलेस्ट्रॉल के लिए लिपिड प्रोफाइल टेस्ट करा लें। अगर रिस्क फैक्टर (फैमिली हिस्ट्री, स्मोकिंग, शराब पीना आदि) हैं तो 25 साल से ही टेस्ट कराएं। अगर सब कुछ ठीक निकलता है तो 2 साल में एक बार टेस्ट करा लें। अगर समस्या लगती है तो डॉक्टर ईसीजी और इको कराने के लिए कहते हैं। ब्लड प्रेशर टेस्ट की कीमत 100-120 रुपये और लिपिड प्रोफाइल टेस्ट की कीमत 600-800 रुपये होती है।

सही रीडिंग
कोलेस्ट्रॉल 200 तक
ब्लड प्रेशर अपर बीपी लोअर बीपी
नॉर्मल 130 से नीचे और 85 से नीचे

एक्सर्साइज
- दिल की बीमारी से बचने के लिए रोजाना कम-से-कम आधा घंटा कार्डियो एक्सरसाइज करना जरूरी है। इससे वजन कम होता है, बीपी कम हो जाता है और दिल की बीमारी की आशंका 25 फीसदी कम हो जाती है।
- कार्डियो एक्सरसाइज में तेज वॉक, जॉगिंग, साइकलिंग, स्विमिंग, एरोबिक्स, डांस आदि शामिल होते हैं। तेज वॉक जॉगिंग यानी हल्की दौड़ से भी बेहतर साबित होती है क्योंकि जॉगिंग में जल्दी थक जाते हैं और घुटनों की समस्या होने का खतरा होता है। वॉक और ब्रिस्क वॉक में फर्क यह है कि वॉक में हम 1 मिनट में आम तौर पर 40-50 कदम चलते हैं जबकि ब्रिस्क वॉक में 1 मिनट में लगभग 80 कदम चलते हैं। जॉगिंग में 160 कदम चलते हैं।
- 5 मिनट डीप ब्रिदिंग, 10 मिनट अनुलोम-विलोम और 5 मिनट शीतली प्राणायाम करें। शीतली प्राणायाम खासतौर पर मन को शांत रखता है और बीपी को मेंटेन करता है।
- 15 मिनट के लिए मेडिटेशन करें।

...गर है दिल की बीमारी
- किसी भी एक्सरसाइज के दौरान अगर बेचैनी, दर्द, उलटी, घबराहट आदि हो, तो वहीं रुक जाएं। डॉक्टर को दिखाने के बाद ही फिर से एक्सरसाइज का प्लान करें।
- हल्की फिजिकल एक्सरसाइज के तौर पर रोजाना 45-50 मिनट वॉक करें। एक बार में नहीं कर सकते तो 15-15 मिनट के लिए तीन बार में करें।
- जॉगिंग या एयरोबिक्स से पहले डॉक्टर से सलाह ले लें, क्योंकि बीपी का लोअर लेवल बढ़ता है।
- रोजाना करीब 30 मिनट कार्डियो एक्सरसाइज जैसे कि साइक्लिंग, स्वीमिंग आदि करें।
- हेवी एक्सरसाइज जैसे कि वेट लिफ्टिंग आदि न करें।
- योग और प्राणायाम करें। दिल के मरीज भस्त्रिका न करें तो बेहतर है।
- ऐसे आसन डॉक्टर की सलाह के बिना न करें, जिनमें सारा वजन सिर पर या हाथों पर आता है, जैसे कि मयूरासन, शीर्षासन आदि।
- शवासन करें। आंखें बंद करके पूरे शरीर के अंगों को बारी-बारी से महसूस करें। इससे मांसपेशियों का तनाव कम होता है। इससे बीपी दूर होता है।

ध्यान रखें 10 बातें
1. स्मोकिंग न करें। इससे दिल की बीमारी की आशंका 50 फीसदी बढ़ जाती है।
2. अपना लोअर बीपी 80 से कम रखें। ब्लड प्रेशर ज्यादा हो तो दिल के लिए काफी खतरा है।
3. फास्टिंग शुगर 80 से कम रखें। डायबीटीज और दिल की बीमारी आपस में जुड़ी हुई हैं।
4. कॉलेस्ट्रॉल 200 या इससे कम रखें। इसमें भी LDL यानी बैड कॉलेस्ट्रॉल 130 से कम रहना चाहिए। जिनको हार्ट की बीमारी हो, उनका LDL 100 से कम हो तो बेहतर है।
5. रोजाना कम-से-कम 45 मिनट सैर और एक्सरसाइज जरूर करें।
6. तनाव न लें। दिल की बीमारियों की बड़ी वजह तनाव है।
7. रेग्युलर चेकअप कराएं, खासकर अगर रिस्क फैक्टर हैं। साथ ही, कार्ब, नमक और तेल कम खाएं।
8. डायबीटीज है तो शुगर के अलावा बीपी और कॉलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल में रखें।
9. फल और सब्जियां खूब खाएं। दिन भर में अलग-अलग रंग के 5 तरह के फल और सब्जियां खाएं।
10. रेड मीट में कम खाएं। यह वजन बढ़ाने के अलावा दिल के लिए भी नुकसानदेह है।

कॉमन गलतियां
1. बीपी को हल्के में लेना: अक्सर लोगों को लगता है कि हाई ब्लड प्रेशर खतरनाक बीमारी नहीं है और वे इसे नजरअंदाज करते रहते हैं। लेकिन अगर यह लंबे समय तक बनी रहे तो हार्ट की मसल्स मोटी हो जाती हैं और हार्ट अटैक की आशंका बढ़ जाती है।
2. ज्यादा गर्भनिरोधक लेना: महिलाएं ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव लेती हैं लेकिन इन्हें बरसों तक लगातार लेने से दिल की बीमारी की आशंका बढ़ जाती है। बेहतर है कि किसी भी कॉन्ट्रासेप्टिव का इस्तेमाल करने से पहले उसके साइड इफेक्ट्स भी जान लें।
3. ओवर एक्सरसाइज: अक्सर लोग ज्यादा एक्सरसाइज कर लेते हैं, जिससे शरीर में पानी की कमी और थकावट, दोनों हो जाते हैं। इससे दिल पर प्रेशर पड़ता है।
4. सॉर्बिट्रेट लेना: कई बार लोग सीने में दर्द होने पर एस्प्रिन की बजाय सॉर्बिट्रेट ले लेते हैं लेकिन यह सही नहीं है। सॉर्बिट्रेट सिर्फ दिल के मरीजों को लेनी चाहिए।

दिल की सेहत के साथी फूड
क्या खाएं

- हाई फाइबर और लो फैट वाली डाइट जैसे कि गेहूं, ज्वार, ओट्स, बाजरा आदि का आटे या दलिया
- फ्लैक्स सीड्स (अलसी के बीज), आधा चम्मच रोजाना
- एक-दो लहसुन एक कली रोजाना
- 5-6 बादाम और 1-2 अखरोट रोजाना
- जामुन, पपीता, सेब, आड़ू जैसे लो-ग्लाइसिमिक इंडेक्स वाले फल
- हरी सब्जियां, साग, शलजम, बीन्स, मटर, ओट्स, सनफ्लावर सीड्स आदि
- ऑलिव ऑयल, कनोला, तिल का तेल और सरसों का तेल, थोड़ी मात्रा में देसी घी भी अच्छा
- मछली। चिकन भी खा सकते हैं लेकिन यह ज्यादा तला-भुना और मसालेदार न हो

 
न खाएं
- मक्खन, मलाई, वनस्पति घी आदि सैचुरेडिट फैट
- मैदा, सूजी, सफेद चावल, चीनी, आलू यानी सफेद चीजें
- पैक्ड चीजें मसलन पैक्ड जूस, बेकरी आइटम्स, सॉस आदि
- रोजाना आधे चम्मच से ज्यादा नमक न लें
- बहुत मीठी चीजें (मिठाई, चॉकलेट) आदि

साथ में नभाटा,साभार।


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