ताज़ा समाचार-->:
अब खबरें देश-दुनिया की एक साथ एक जगह पर-->

प्रमुख समाचार

भारत में एक चीनी सैनिक की आपबीती
1963 में वांग छी भारत में पकड़े गए, उनकी अंतिम इच्छा चीन जाने की है

नई दिल्ली

१ फरवरी २०१७

मेरा नाम वांग छी है, मेरी उम्र 77 साल है. मैं चीन के शियानयांग शहर में पैदा हुआ था, मगर 54 साल भारत में गुज़ारने के बाद अब मैं कहाँ का हूँ? मैं मरने से पहले सिर्फ़ एक बार चीन जाना चाहता हूँ, प्रधानमंत्रियों को चिट्ठी लिखने से लेकर अदालत के चक्कर काटने तक मैंने सब किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. मेरी कहानी किसी उपन्यास या फ़िल्म से कम नहीं है. जैसे-जैसे मेरी उम्र ढल रही है मुझे चीन में बीता अपना बचपन बहुत याद आता है लेकिन वो भी धुंधला-सा है.  मैं एक गरीब परिवार में जन्मा, मेरा पिता किसान थे. हमारा परिवार इन दिनों के चीनी परिवारों की तरह छोटा नहीं था, हम पाँच भाई थे और हमारी दो बहनें थीं, मैं अपने माँ-बाप का मझंला बेटा था. अब तो मैं चीन में बिताये दिनों की बातें भूलने लगा हूँ. ये बाइक वाली तस्वीर 1959 की है तब मैं शांसी प्रांतीय सरकार के खेलकूद विभाग में काम करता था, मेरे साथ एक स्थानीय कर्मचारी की बेटी है जिसका नाम अब मुझे याद नहीं आ रहा. यही वह समय था जब मैंने गाड़ी चलाना सीखा.


चीन में बचपन, भारत में जवानी।

मैंने मेहनत से टेक्निकल ट्रेनिंग की और 1960 में चीनी सेना में शामिल हो गया. सेना की वर्दी पहनकर मैं बहुत ख़ुश हुआ था और ये तस्वीर जो आप देख रहे हैं तभी खिंचवाई थी. जब मैं सेना में भर्ती हुआ उसी दौरान मेरे पिता की मौत हो गई थी लेकिन घरवालों ने मुझसे ये बात छिपाई ताकि मुझे सदमा न लगे. परिवार से दूर रहना बहुत खलता था लेकिन मुझे क्या पता था कि मैं हमेशा के लिए परिवार से दूर हो जाऊँगा. वांग 1960 में चीनी सेना में भर्ती हुए थे.  ये बात जनवरी 1963 की है, मेरी क़िस्मत अचानक ही हमेशा के लिए बदल गई, मैं रास्ता भटक गया, पहाड़ों जंगलों से गुज़रते हुए मैं भारत के तवांग इलाक़े में चला गया जो अरूणाचल प्रदेश में है. वहाँ मुझे भारतीय रेड क्रॉस की जीप मिली जिन्होंने मुझे भारतीय सेना के हवाले कर दिया. भारत के अफ़सर कहते हैं कि मैं ग़ैर-क़ानूनी ढंग से भारत में घुसा था.

चीन के शांसी प्रांत से भारत के बालाघाट की दूरी लगभग तीन हज़ार किलोमीटर है. मेरे सेना में भर्ती होने के दो साल के भीतर ही, अक्तूबर 1962 में भारत और चीन के बीच लड़ाई शुरू हो गई. मैं सीमा पर तैनात था, पकड़े जाने पर मुझे युद्धबंदी बना लिया गया, पहले दिसपुर आर्मी कैम्प और फिर दिल्ली भेज दिया गया. मैं तीन साल तक मेरठ और अजमेर की जेल में पड़ा सोचता रहा कि अब मेरा भविष्य क्या होगा? इसके बाद मुझे पंजाब की नाभा जेल में भेज दिया गया, मुझे पता नहीं था कि अब इसी देश में मेरा वर्तमान और भविष्य दोनों है. मैं सोचता था, अब ज़िंदगी में क्या करूं. इधर रहूँ तब मारपीट, उधर जाऊँ तो पता नहीं क्या होगा? ये परेशानी कब तक सहूँ?


बालाघाट ज़िले के तिरोड़ी गाँव में वांग।

वांग अपनी दोनों बेटियों के साथ: विदेशी ज़मीन, अलग भाषा और दुश्मन देश का सैनिक होने की वजह से जितनी परेशानियाँ हो सकती थीं, सब मुझे हुईं. चंडीगढ़ हाई कोर्ट में मेरा मुकदमा चला और मुझे रिहा कर दिया गया. 1969 में मुझे तिरोड़ी में छोड़ दिया गया. मुझे चीन क्यों नहीं भेजा गया, ये बात मेरी समझ में नहीं आती. कोई ऐसा दिन नहीं गुज़रता जब मैं अपने परिवार को याद नहीं करता. मैगनीज़ की खानों के लिए तिरोड़ी को जाना जाता है, अब यही मेरा घर है, मैंने धीरे-धीरे टूटी-फूटी हिंदी सीख ली है. इतने साल गुज़र गए लेकिन चीन जाने के लिए ज़रूरी ‘एग्ज़िट वीज़ा’ का इंतज़ार ख़त्म नहीं हुआ है. मैंने चॉपस्टिक्स ख़रीदी है, मुझे चीनी खाने की याद आती है लेकिन यहाँ तिरोड़ी में कैसे मिलेगा? आज तक मैं हाथ से चावल-दाल नहीं खा पाता.  उन दिनों तिरोड़ी के कंपनी रोड पर मारवाड़ी सेठ इंदरचंद जैन की गेहूँ पीसने की दुकान हुआ करती थी. पुलिस ने मुझे उनके हवाले कर दिया. सेठ जी ने ही मुझे राजबहादुर नाम दिया. मैं एक हफ़्ते में काम सीख गया और पास ही एक झोपड़ी में रहने लगा. मैं पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करता रहा, पचास किलोमीटर साइकिल चलाकर बालाघाट तक जाता था. मैंने गाय भी पाली और उसका दूध बेचकर गुज़ारा करता रहा. मेरा ख़र्च ज्यादा नहीं था, पैसे बचाकर मैंने ख़ुद दुकान खोल ली, कई बार मेरा यहाँ के पुलिसवालों से झगड़ा हुआ, उन्होंने मुझे बेरहमी से पीटा लेकिन मैं रिश्वत देने को तैयार नहीं हुआ.


अपनी माँ की तस्वीर के साथ वांग।

परिवार ये भी है और परिवार वो भी . अपनी माँ की तस्वीर के साथ वांग, जिनसे वे नहीं मिल सके.  मैं माँ को लगातार चिट्ठी लिखता था लेकिन वो वापस आ जाते थे, माँ तक पहुँचते ही नहीं थे. मैं सोचता था मेरी याद में माँ कितना रोती होगी, ये सोचकर मुझे बहुत रोना आता था. कई सालों के बाद एयरमेल से भेजी गई एक चिट्ठी माँ तक पहुँची और उसका जवाब भी आया. उसमें लिखा था कि मेरे ज़िंदा होने की ख़बर सुनकर माँ की आधी बीमारी ठीक हो गई है. मेरे अनुरोध पर अगली बार चिट्ठी के साथ माँ की एक तस्वीर भी आई. माँ से 2002 में मोबाइल पर बात भी हुई, उन्होंने कहा कि जल्दी से आ जाओ ताकि मरने से पहले तुम्हें देख सकूँ लेकिन मैं उनकी ये अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर सका. मेरी तस्वीर को देखते-देखते 2006 में माँ ने हमेशा के लिए आँखें बंद कर लीं.

वांग की शादी 1975 में सुशीला से हुई: मैं गाँव में अकेला रह रहा था इसलिए मुझ पर शादी का दबाव बढ़ने लगा था. एक ईसाई लड़की मुझे अच्छी लगी लेकिन धर्म आड़े आ गया. आखिरकार, 1975 में एक महार लड़की सुशीला से मेरी शादी एक तरह से ज़बरदस्ती करवा दी गई. ये शादी न मेरे लिए आसान थी, न बेहद गरीब घर की सुशीला के लिए. लोगों ने उसको समझाया-बुझाया, हम एक-दूसरे से बात भी नहीं कर पाते थे. कुछ महीने हमने किसी तरह निभाया और उसके बाद हमें एक दूसरे की आदत पड़ गई. मेरे चीन जाने की बात सुनकर सुशीला काफ़ी घबराती है, उसे लगता है कि अगर मैं गया तो फिर लौटकर नहीं आऊँगा. वांग अब 77 साल के हो चुके हैं: आज मैं अपनी दो बेटियों, बेटे, बहू, नाती और पोती के साथ इस बड़े से परिवार में रह रहा हूँ, यही मेरे जीवन का सहारा है, बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं. दोनों बच्चे मुझे हमेशा घेरे रहते हैं, लेकिन इस बूढ़ी उम्र में एक ही तमन्ना है कि एक बार चीन में अपने परिवार से मिल लूँ. मैं इन बच्चों को छोड़कर कहां जाऊंगा. मेरा परिवार यही है. मैं अब 77 साल का हूँ और मेरे भाई चिर्युआन 82 साल के. बीबीसी की मदद से पहली बार मैंने मोबाइल फ़ोन पर अपने भाई से बात की, वे मुझसे तीन हज़ार किलोमीटर दूर बैठे थे लेकिन मैं उन्हें देख और सुन पा रहा था, बस छू नहीं सकता था. 54 साल बाद अपने भाई को देखा, मैं तो उन्हें पहचान भी नहीं पा रहा था, इतने समय बाद मैंने मंडैरिन में बात की, यहाँ कोई नहीं है जिससे मैं अपनी भाषा में बात कर सकूँ. मेरा जी भर आया, बार-बार रोना आ रहा था. भाई बार-बार पूछ रहे थे, कब आओगे? कह रहे थे कि मैं तुमसे मिलने के लिए ही ज़िंदा हूं, बता रहे थे कि चीन इतना आगे बढ़ गया है कि मैं देखकर दंग रह जाऊँगा. अब हमारे घर में गाड़ियां हैं और ट्रैक्टर से खेती होती है. मैं चाहता हूँ कि अभी उड़कर पहुँच जाऊँ.

वांग का चीनी पासपोर्ट: 2009 में मेरा भतीजा भारत घूमने आया जिसकी मदद से मुझे चीनी पासपोर्ट मिल गया. अब मेरे पास चीन का पासपोर्ट है लेकिन अफ़सर कहते हैं कि भारत से बाहर जाने के लिए मुझे एग्ज़िट वीज़ा चाहिए क्योंकि मेरे आने का वीज़ा नहीं है. बीबीसी ने इस मामले में गृह मंत्रालय को सवाल भेजे हैं लेकिन अभी जवाब नहीं मिला है. बालाघाट के कलेक्टर भरत यादव ने जब मीडिया में मेरी कहानी पढ़ी तो अपने दफ़्तर बुलवाया, उन्होंने माना कि "कमियाँ" हैं, उन्होंने सभी प्रशासनिक मदद का भरोसा दिलाया लेकिन न जाने कब वो दिन आएगा जब मैं चीन जा सकूँगा. साभार-बीबीसी। 31 जनवरी 2017।


जरा ठहरें...
 
 
Third Eye World News
इन तस्वीरों को जरूर देखें!
Jara Idhar Bhi
जरा इधर भी

Site Footer
इस पर आपकी क्या राय है?
देश में बढ़ती आतंकी घटना और सीमापार से पाकिस्तान की तरफ से हो रही गोलाबारी की घटना मोदी सरकार की नाकामी है...
जी हां बिल्कुल मोदी सरकार की नाकामी है।
कोई नाकामी नहीं है।
कह नहीं सकते।
 
     
ग्रह-नक्षत्र और आपके सितारे
शेयर बाज़ार का ताज़ा ग्राफ
'थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़' अब सोशल मीडिया पर
 फेसबुक                                 पसंद करें
ट्विटर  ट्विटर                                 फॉलो करें
©Third Eye World News. All Rights Reserved.