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वाह रे सरकार! कभी आईबी तो कभी सीबीआई को होना पड़ रहा है लाचार!

आकाश श्रीवास्तव

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

नई दिल्ली, ३ फरवरी २०१९

पिछले कुछ समय से देश की सर्वोच्च खुफिया एजेंसियों और जांच एजेंसियों की स्थिति बड़ी अजीब होती जा रही है। ये सब उस मोदीराज और भाजपा के शासन काल में हो रहा है जो कभी खुद देश की इन सर्वोच्च एजेंसियों की कार्य प्रणाली पर उंगली उठाया करते थे। अब उन्हीं के शासनकाल में देश की सर्वोच्च आंतरिक खुफिया एजेंसी आईबी के अधिकारियों को सीबीआई गिरफ्तार कर लेती है। तो कभी सीबीआई के अधिकारियों को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है। जो हास्यास्पद के साथ-साथ अत्यंत गंभीर मामला है।


आइए पिछली एक दो घटनाओं का जिक्र कर लेते हैं। जिसकी वजह से मोदी के शासन काल की इन सर्वोच्च एजेंसियों की अच्छी खासी किरकिरी हुई है। अभी हाल में दो दिन भी नहीं बीता है कि कोलकाता में जांच के लिए गई सीबीआई के अधिकारियों को कोलकाता पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। घटना 3 फरवरी की है जब पश्चिम बंगाल के शारदा चिटफंड घोटाले की जांच के लिए कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के घर पहुंची सीबीआई टीम के पांच अधिकारियों को राज्य पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिस सीबीआई अधिकारियों को शेक्सपीयर थाने ले गई गई। स्थिति उस समय और खराब हो गयी है जब कोलकाता पुलिस और सीबीआई अधिकारियों के बीच हाथापाई की नौबत आ गयी।

इस मामले में सीबीआई पूरी रिपोर्ट केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भेजी। उसके बाद आनन-फानन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता पुलिस आयुक्त के घर पहुंची। गृह मंत्रालय ने गंभीरता को देखते हुए कोलकाता स्थिति सीबीआई कार्यालय को सुरक्षा देने के लिए तुरंत केंद्रीय पुलिस बल को तैनात कर दिया। उसके बाद कोलकाता पुलिस पीछे हटी। मामले को राजनीतिक रंग देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धरने पर बैठ गयी। और सर्वोच्च न्यायालय गयी सीबीआई टीम को न्यायालय से पुलिस आयुक्त राजीव कुमार को सहयोग देने का आदेश दिया।


दूसरी घटना अक्टूबर 2018 की है। जब पूर्व सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के घर से गुजर रहे आईबी के अधिकारियों को पूर्व सीबीआई मुखिया के सुरक्षा अधिकारियों ने एक आम अपराधी की तरह कॉलर पकड़ के हिरासत में ले लिया। जबकि आईबी ने इस मामले में कहा था कि उसके अधिकारी नियमित अपने काम पर थे। बाद में चारों को छोड़ दिया गया था। इस मामले में सीबीआई और आईबी के साथ गृहमंत्रालय की आपस में समन्वय न होने पर मीडिया में जमकर आलोचन हुई थी। कुल मिलाकर कम से कम ऐसी व्यवस्था और समन्वय होना चाहिए की देश की सर्वोच्च जांच और खुफिया एजेंसियों में बेहतर तालमेल के साथ उनकी गरिमा बनी रहे। और भविष्य में इन्हें फिर लाचारी और शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े।




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