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देश को मिली पहली सोलर रेल गाड़ी
रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने हरी झंड़ी दिखाकर रवाना किया।

आकाश श्रीवास्तव

नई दिल्ली

१४ जुलाई २०१७

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने पहली सोलर पैनल वाली ट्रेन को हरी झंड़ी दिखाकर रवाना शुरू किया। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने सफदरजंग रेलवे स्टेशन से इस ट्रेन को रवाना किया। शुक्रवार को यह हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन तक चली। इन नई गाड़ी को दिल्ली से फारुखनगर (हरियाणा) के बीच चलाने की तैयारी है। हालांकि अभी इसकी औपचारिक घोषणा नहीं की गई। इस ट्रेन से हर वर्ष 21 हजार लीटर डीजल की बचत हो पाएगी और रेलवे को प्रति वर्ष 12 लाख रुपए की बचत होगी। शुक्रवार को शुरू हुई डीईएमयू ट्रेन में सौर ऊर्जा को बैटरी में संचित किया जा सकेगा। इससे रात के समय भी इसका उपयोग हो सकेगा और लाइट, पंखे, इंफॉर्मेशन डिस्प्ले आदि की जरूरत सोलर ऊर्जा से पूरी होगी।


बड़ी लाइन की कई गाड़ियों के एक या दो कोच में सोलर पैनल लगाए गए हैं। राजस्थान में भी सोलर पैनल युक्त लोकल ट्रेन का परीक्षण हो चुका है लेकिन इनमें सौर ऊर्जा को संचित करने की सुविधा नहीं है। चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में निर्मित इस छह कोच वाले रैक को दिल्ली के शकूरबस्ती वर्कशॉप में सौर पैनलों से सुसज्जित किया गया है। यहां स्थित इंडियन रेलवेज ऑर्गेनाइजेशन ऑफ अल्टरनेटिव फ्यूल ने ऐसा इन्वर्टर बनाया है, बैटरी की मदद से रात के समय भी भरपूर ऊर्जा देता है। इसकी कुल लागत 13.54 करोड़ रुपए है। हर पैसेंजर कोच बनाने में 1 करोड़ जबकि मोटर कोच बनाने में 2.5 करोड़ खर्च हुए हैं। हर सोलर पैनल पर 9 लाख रुपए का खर्च आया है। ट्रेन के एक कोच में 69 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। रेलवे बोर्ड के सदस्य (रॉलिंग स्टॉक) रवींद्र गुप्ता के अनुसार सोलर पावर पहले शहरी ट्रेनों और फिर लंबी दूरी की ट्रेनों में लगाए जाएंगे। अगले कुछ दिनों में 50 अन्य कोचों में ऐसे ही सोलर पैनल्स लगाने की योजना है। पूरी परियोजना लागू हो जाने पर रेलवे को हर साल 700 करोड़ रुपए की बचत होगी। इस नई ट्रेन की कई विशेषताएं हैं। सोलर पैनल दिन भर में 20 सोलर यूनिट बिजली बनाएंगे, जो 120 एंपीयर ऑवर (एएच) क्षमता की बैटरियों में सहेज ली जाएगी।

हर कोच पर 300-300 वॉट के 16-16 सौर पैनल लगे हैं, जिनकी कुल क्षमता 4.5 किलोवाट है। इससे करीब 28 पंखे और 20 ट्यूबलाइट जल सकेंगी। संरक्षित सोलर बिजली से ट्रेन का काम दो दिन तक चल सकता है। किसी भी आपात परिस्थिति में लोड अपने आप डीजल एनर्जी पर शिफ्ट हो जाएगा। प्रति कोच के हिसाब से हर वर्ष नौ टन कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी। अगले छह महीने में दिल्ली स्थित शकूर बस्ती वर्कशॉप में इस तरह के 24 और कोच तैयार किए जा रहे हैं।




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