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प्रजातंत्र में कोई पक्ष शत्रु अथवा विचारधारा अस्प्रश्य नहीं होती है - मेजर जनरल परिहार
मेजर जनरल परिहार दिल्ली स्थिति आर. आर. अस्पताल नेत्र विभाग के प्रमुख रह चुके हैं

आकाश श्रीवास्तव

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

नई दिल्ली, 12 मई 2019

राष्ट्र निर्माण एवं प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक अवरल सरित प्रवाह की हर बूँद भारत के प्रत्येक नागरिक की एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर, उनके धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषा और जीवन शैली की विभिन्नता के समस्त अणुओं के समागम से ही संभव है. भारत का हर नागरिक अपने आप में एक पूर्ण व्यक्तिव है और  हमें यह आत्मसात करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हर नागरिक राष्ट्र के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है  जितने हम स्वयं हैं.


मतदान करने के बाद पत्नी के साथ मेजर जनरल (सेवानि) परिहार।

फिलहाल आज प्रजातंत्र के “मतदान”  महापर्व के शुभ अवसर पर हमने राष्ट्र -  समृद्धि, सद्भाव , आपसी सामंजस्य  और एकता को दृढ़ विश्वास के साथ मजबूत रखने के प्रण के साथ मतदान किया. प्रात: ६.४२ बजे पहुंचे , ७.१२ बजे मतदान प्रारंभ हुआ  तथा ७.२२ पर मतदान सम्पन्न किया. परिवार में शामिल हम तीनों एक साथ एक कार में बैठ कर मतदान के लिये गए परन्तु मतदान से पहले और मतदान के पश्चात भी हम तीनों नें मतदान की गोपनीयता अथवा व्यक्तिगत निर्णय क्षमता की पवित्रता को दूषित नहीं होने दिया. प्रजातंत्र में कोई पक्ष शत्रु अथवा कोई विचार धारा अस्प्रश्य नहीं होती है.वैचारिक मतभेद स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक और प्राण वायु के समान  हैं. पक्ष और प्रतिपक्ष  प्रजातन्त्र के दो पैर अथवा स्तम्भ हैं.मतदाता प्रजातन्त्र का  हृदय , यकृत ,जीवन धमनी और मस्तिष्क के समान है. कार्य पालिका ,न्याय पालिका, चुनाव आयोग और पत्रकारिता (जिसमें समाचार पत्र एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी शामिल हैं) के सशक्त कंधों पर प्रजातंत्र  की अमृत धारा को सदैव स्वच्छ और बिना बंधन के अविरल प्रवाह की रक्षा और पोषण की भीष्म प्रतिज्ञा है.

आज के परिपेक्ष यह कथन कितना सामयिक है उसके आकलन की ज़िम्मेदारी हम सभी को निभानी है परंतु हमारे कृत्यों का वास्तविक पुनरावलोकन तो आने वाला समय ही करेगा. राष्ट्र एक व्यक्ति से कभी नहीं बनता है और ना ही बिगड़ता है. राष्ट्र का जीवन काल एक दशक ,एक शताब्दी अथवा एक युग से कहीं अधिक अनंत - अनंत काल तक होता है. आधुनिक भारत में प्रजातंत्र की पहली फुहार  का स्पंदन 1947 से पहले 1935 -37 में हुआ था. वास्तविक रूप में भारत में प्रजातंत्र  सतयुग से भी पहले से फलफूल रहा है.


मतदान के लिए अपने बेटे को भी साथ ले गए मेजर जनरल परिहार।

भगवान राम ने एक नागरिक की पुकार पर राजधर्म की मर्यादा का पालन करते हुए माँ सीता का परित्याग किया ज्योकि राजकाज में जन गण की भूमिका , वैचारिक स्वतन्त्रता तथा सर्वोच्य शिखर पर प्रतिष्ठित नृप की प्रजातंत्र के प्रति निष्ठा को सर्वोपरी रखते हुए आत्मसुख और भावनाओं का परित्याग राजधर्म पालन का एक उत्कृष्ठ उदाहरण है. इस प्रकार भगवान श्री राम ने राजतंत्र के पालन के लिए सर्व कालीन एवं प्रजा सर्वोच्च का माप दंड निर्धारित कर विश्व में जनतंत्र की सर्वप्रथम ,सर्व सार्थक एवं अमृत अमर व्याख्या एवं नीति निर्देश प्रदान किया.आज के परिपेक्ष्य में यह घटना असंभव प्रतीत होती है.चाणक्य ने चन्द्र गुप्त मौर्य का चयन प्रजातंत्र की भावना को जागृत करते हुए गुप्त साम्राज्य में जनगण की भागीदारी एवं प्रतिबध्त्ता शासन के निम्नतम स्तर से शीर्ष शिखर तक निश्चित कर उसका पालन किया.


प्रशासन की  निरंकुश चाल को चाणक्य ,गुरु और प्रजातंत्र के  महावत के अंकुश की सदैव आवश्यकता पड़ती है और भारतीय जनता ने प्रजातंत्र की रक्षा के लिए इस शस्त्र का  उपयुक्त समय पर सफलता पूर्वक उपयोग कर अपनी भूमिका सार्थक की है.मुझे भारत के प्रत्येक नागरिक की राष्ट्र और प्रजातंत्र के प्रति अटूट अनुराग और प्रतिबध्त्ता पर पूर्ण विश्वास है.प्रजातंत्र के इस समुन्द्र मंथन से अमृत ही निकलेगा और कुरीतियों और कुटिल तंत्र का विष धरातल में ही निष्क्रिय हो विलीन हो जायेगा. भारत राष्ट्र एवं प्रजातंत्र सदैव प्रगति पथ पर अग्रसर हो सर्वोच्च शिखर पर सदैव प्रतिष्ठित रहे.

मेजर जनरल (सेवा निवृत्ति) जितेंद्र कुमार सिंह परिहार दिल्ली स्थिति सेना के आर आर अस्पताल के नेत्र विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। और देश के एक पूर्व राष्ट्रपति की आंखों का ईलाज कर चुके हैं।



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