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देश एवं राजनीति

लॉकडाऊन करने से पहले सरकार ने सभी परिस्थितियों पर विचार नहीं किया - सत्यदेव चौधरी

सत्य देव चौधरी

राजनीतिक विष्लेशक

नई दिल्ली, 17 जून 2020

कोरोना लॉकडाउन की घोषणा करते समय पहले दिन से ही साधनों को सीमित बताते हुए हमारे प्रधानमंत्री ने लक्ष्मण रेखा खींच कर सभी देशवासियों को अपने घरों मे ही रहने के आदेश दिये थे। लॉकडाउन की घोषणा करते समय बिना किसी विकल्प के सरकार ने आवागमन की सभी सुविधाओं को जैसे रेल, हवाई जहाज, बसों को 100 प्रतिशत रोक दिया, दूसरे राज्यों से आए मजदूरों सहित जो जहां थे वहीं फंस गए। शहरों में संगठित व असंगठित दोनों क्षेत्रों में अचानक मजदूरों के रोजगार समाप्त हो गए, और किसी प्रकार की भी जैसे खाना, दवाई, किराया आदि के लिए सरकारी सहायता न मिलने के कारण भारी संख्या में मजदूरों ने अपने ही राज्यों और गांवों को अधिक सुरक्षित मानकर पलायन करना आरम्भ कर दिया।


बिना सरकारी सहायता के एक से दो हजार किलोमीटर दूरी के स्थानों पर पहुंचने के लिए भी रेल या बस की सुविधाओं का प्रबंध न होने के कारण गरीब मजदूरों ने नवजात शिशुओं को अपने कंधो पर लाद कर बूढ़े-बुजुर्गों के साथ, महिलाओं के साथ, यहां तक कि गर्भवती महिलाओं के साथ अपने गांवों तक जाने के लिए सड़क मार्ग द्वारा पैदल ही निकल पड़े। भूख के कारण लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन करके मजदूर स्वयं भूख के राक्षस के सामने आ गए और भूख का राक्षस उन्हें बिना पुष्पक विमान में बिठाए चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे सड़कों पर घसीटते हुए क्वारंटाइन वाटिका तक ले गया, जहां न पानी था, न भोजन, न चिकित्सा यहां तक कि शौचालय भी साफ नहीं थे। यदि लाॅकडाउन आवश्यक ही था तब भी सरकार ये विचार तो करती कि बिना किसी सहायता की योजना बनाए लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन रूकेगा कैसे? कोरोना महामारी को समाप्त करने के लिए कभी लक्ष्मण रेखा खींच कर कभी ताली और कभी थाली बजाकर कभी घंटे बजाकर, कभी मोमबती, दीपक, टार्च जलाकर देशवासियों को अंधविश्वास के अंधेरे में घकेलकर अपनी जिम्मेवारी और उत्तरदायित्व से बचने के लिए समय बर्बाद करने में लगे हुए हैं।

माना कि कोरोना महामारी का कारण सरकार नहीं है, परन्तु कोरोना के कारण देश के गरीबों के लिए अधिक से अधिक सहायता की योजनाएं तो सरकार ही बनाएगी! गरीब मजदूरों ने अपने गांवों में जाना अधिक सुरक्षित और उचित इसलिए माना क्योंकि बीते 70 बर्षों की राजनीति में किसी भी सरकार ने ऐसी व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जिससे गरीबों और मजदूरों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा का प्रबंध सुनिश्चित किया गया हो। गरीब मजदूरों ने तो अपने घरों में जाने के लिए लक्ष्मणरेखा का उल्लंधन किया, कौन से उन्होंने राष्ट्रपति भवन या प्रधानमंत्री निवास पर कब्जा करने के लिए सड़कों पर उतरे और पुलिस के डंडे भी खाए। क्या सत्ताधारी नेताओं से ये प्रश्न करना अनुचित है कि बिना साधनों के कौन से जुमले से विश्वगुरू और विश्व की महान अर्थव्यवस्था बनोगे? मजदूरों को लक्ष्मण रेखा में बांधकर कौन से सोने का हिरण पकड़कर भारत को सोने की चिड़िया बना दोगे?


सच्चाई ये है कि वर्तमान सरकार सहित बीती सभी सरकारों ने देश के साधनों को केवल गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति के माध्यम से सत्ता पर कब्जा करने के काम में लेकर बर्बाद किये। विभाजन के पश्चात हमारे धूर्त नेताओं ने अधूरी आजादी और झूठे प्रजातंत्र का षड़यंत्र करके गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति भारत के गरीबों पर थोपी, और इसी का परिणाम ये हुआ कि देश के अधिकतम साधनों को मुट्ठी भर धनाड्यों और गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति के दबंगी नेताओं ने कब्जा लिये, गठबंधन की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था में आज तक गरीबों और मजदूरों के लिए न तो साधन जुटे और भविष्य में न कभी जुटेंगे। कोरोना के विषय पर हुए प्रबंधों में कमी की आलोचना तो छोड़ दीजिए, कुछ सुझाव देना भी सत्ताधारियों को राजनीति दिखाई देती है, किन्तु सत्ताधारियों का हर सरकारी निर्णय राजनीति पर ही आधारित होता है। कोरोना के समय गरीब मजदूरों को अपने घर भेजना, गरीब बेरोजगारों को भोजन देना, जैसे सामान्य प्रबंधों के लिए भी सरकार ठोस योजना नहीं बना पाई,उपर से सरकार सामान्य सुविधाएं देने के लिए भी सीमित साधनों का रोना रोती है। कोरोना की महामारी सिर पर खड़ी थी, साधन सीमित थे फिर भी सरकार ने:


1. गुजरात में आयोजित फरवरी 2020 के अंत में अमेरिका से आए राष्ट्रपति के रोड शो में अरबों रूपये खर्च किए, कोरोना महामारी के होते हुए भी, सीमित साधनों को केवल अपनी महत्वाकांक्षा के लिए ऐसे अनावश्यक आयोजनों पर बर्बाद करके नेताओं ने अपनी मूर्खता का प्रमाण दिया। गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति से बने नेताओं की सरकार से ये प्रश्न करने का साहस कौन करे कि कोरोना महामारी जैसे संकटकाल में इस प्रकार के राजनीतिक महत्वाकांक्षी आयोजनों का निर्णय उचित और आवश्यक था या नहीं? इस आयोजन से और कुछ हुआ कि नहीं परन्तु अनमोल समय और सीमितसाधनों की बर्बादी तो अवश्य हुई, ऐसा तो नहीं हुआ कि समय और साधनों की बर्बादी किए बिना हमारे प्रधानमंत्री ने लंगोट पहनकर कंधों पर गदा धारण करके उड़कर जाने आने में न तो पल भर का समय लगाया और न ही एक चवन्नी खर्च करी।
2. जिस समय कोरोना महामारी का संकट पैर पसार रहा था, हमारे गठबंधन से बने सत्ताधारी नेता गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति का नंगा खेल खेलते हुए मध्य प्रदेश के विधायकों को अनगिनत धन के प्रयोग से खरीदने में और मध्य प्रदेश की बनी हुई सरकार को दबोचने में व्यस्त थे। कितना अनमोल समय और धन गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति को बल देने के बदले कोरोना महामारी से निकलने के लिए उपयोग में लाया जा सकता था।

एक तो कोरोना जैसी महामारी की विपत्ति उपर से गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति जिसमें सबसे अधिक कष्टों का प्रकोप देश के गरीबों और मजदूरों को सहन करना पड़ रहा है।गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति के नेताओं और शासकों में विवेक, नैतिकता और न्याय शून्य हो जाता है, दया धर्म, प्यार, प्रेम, सेवा, त्याग और करूणा समाप्त हो जाती है, योग्यता और कुशलता के बदले दबंगी और भ्रष्टाचार को आधार मानते हुए केवल पक्षपात और ध्रुवीकरण की राजनीति के सहारे सत्ता पर कब्जा करने के षड़यंत्र और अपने प्रतिद्वंदी राजनीतिक दलों को समाप्त करने की योजनाएं बनती हैं।


मेरे प्यारे नौजवान मजदूर भाइयो और साथियो, आप मेरी एक बात अच्छे से समझ लें कि चुनावों के समय केवल नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को बदल देने से आपको अच्छी व्यवस्था मिल जाएगी, इस भ्रमित स्थिति में मत बने रहना। अच्छी व्यवस्था की छटपटाहट के कारण राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं का परिवर्तन तो हम बीते 70 वर्षों की राजनीति में अनेकों बार कर चुके, परन्तु आपने अनुभव किया होगा कि हर परिवर्तन का रूप पहले से अधिक भयानक ही देखने को मिला।

क्योंकि हर राजनीतिक पार्टी और उनके नेता सर्वप्रथम गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति से सहमत होकर चुनावों में भाग लेते हैं, और क्योंकि हर राजनीतिक पार्टी और नेताओं ने चुनावों से पहले और पश्चात् गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति करने की प्रतिज्ञा और संकल्प ले रखा है, और क्योंकि गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति का आधार भ्रष्ट समझौते, अपराधियों को टिकट देना, झूठे और लुभावने नारे, आश्वासन और भाषण देना, हिंदू-मुसलमान के नाम से मतदाताओं का ध्रुवीकरण करना, बेशुमार कालेधन के प्रयोग से मतदाताओं को प्रभावित करना, विधायकों की खरीद-फरोख्त करके सरकार बनाने के लिए बहुमत बना लेना,इसके अलावा गठबंधन की राजनीति में अनगिनत पक्षपात से भरे और अनैतिक निर्णय लिए जाते
हैं, इसीलिए गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति के रहते चाहे कोई भी राजनीतिक दल सरकार बनाए, मजदूरों को न्यायप्रिय व्यवस्था मिलना असम्भव है।

सभी आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक समस्याओं का एकमात्र कारण है गठबंधन की राजनीति यानि सांसदों या विधायको के बहुमत से सरकार बनाना, वर्तमान गठबंधन की राजनीति के विकल्प में सत्य बहुमत की गठबंधनमुक्त राजनीति यानि मतदाताओं के बहुमत से सरकार बनाने की राजनीति को स्वीकार करके ही इन सभी समस्याओं का समाधान सम्भव है। इसी वर्ष होने वाले बिहार विधानसभा के चुनावों में सत्य बहुमत पार्टी को अपना समर्थन देकर किस प्रकार न्यायप्रिय व लोकप्रिय व्यवस्था बनती है अपनी आंखों से देख लेना। सत्य बहुमत की राजनीति के माध्यम से पूरे भारत में राजनीति का नया रूप देखने को मिलेगा। समझकर और सत्य बहुमत की राजनीति से सहमत होकर सत्य बहुमत पार्टी को अपना समर्थन व सहयोग देकर भारत को विश्व का सर्वश्रेष्ठ, शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनाने में सहयोगी बनकर गर्व का अनुभव करें। सत्य बहुमत की राजनीति पर चर्चा करने के लिए आप कभी भी समय निश्चित करके मेरे से मिलने का कार्यक्रम बना सकते हैं। वीडियो देखकर लाइक, कमेंट, सब्सक्राइब और शेयर करें। आपके सुझाव, सहयोग और समर्थन की प्रतीक्षा में परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि हम सबको स्वस्थ व प्रसन्न रखे।


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