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भारतीय रेलवे दुनिया की ऐसी रेलवे जिसके सुरक्षा बल के पास कोई वैधानिक शक्ति नहीं - यूएस झा, प्रधान सचिव आरपीएफ एसोसिएशन

आकाश श्रीवास्तव

नई दिल्ली ,

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

भारतीय रेलवे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेलवे है। जिसका पूरे देश में लगभग 65 किमी का जाल बिछा हुआ है। यही नहीं भारतीय रेलवे रोजाना लगभग तीन करोड़ यात्रियों को देश के एक जगह से दूसरे जगह ले आती ले जाती है। इस पूरे विशाल नेटवर्क, रेल यात्रियों और उनकी संपत्तियों की रखवाली की जिम्मेदारी रेलवे सुरक्षा बल यानि आरपीएफ की है। आज आरपीएफ के पास अनेक चुनौतियां हैं जिसकी वजह से आरपीएफ एसोसिएशन अपनी स्वंयप्रभुता और स्वायत्ता की मांग लंबे समय से करते आ रहा है। ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन के प्रधान सचिव उमा शंकर झा जो यूएस झा के नाम से भी जाने जाते हैं और जिन्हें पूरे देश के आरपीएफ कर्मचारी और अधिकारी, सम्मान से बाबाजी के नाम से पुकारते हैं, ने थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़ के संपादक आकाश श्रीवास्तव के साथ एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि भारत को छोड़कर पूरी दुनिया की रेलवे के पास अपनी एक अलग और स्वतंत्र सुरक्षा बल है।


उमाशंकर झा, प्रधान सचिव ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन।

जिसके पास पुलिस की तरह सारी संवैधानिक कार्य शक्तियां हैं। जो रेलवे और रेल यात्रियों के साथ होने वाले आपराधिक घटनाओं और प्राकृतिक घटनाओं से निपटाने और सुलझाने के लिए स्वतंत्र हैं। सिर्फ हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जिसकी रेलवे के पास अपना कोई स्वतंत्र सुरक्षा ईकाई तंत्र और वैधानिक ताकत नहीं है। यूएस झा ने कहा “ मैं लगभग 40 साल से इस आवाज को उठा रहा हूं और उठाता रहा हूं लेकिन सरकार के कान में जूं नहीं रेंग रही है”।

उन्होंने कहा रेलवे और रेल यात्रियों की संपूर्ण और पुख्ता सुरक्षा तब तक नहीं की जा सकती है जब तक रेलवे की खुद का अपना स्वायत्त सुरक्षा बल नहीं होगा। जिसके पास स्वतंत्र संवैधानिक कार्य शक्तियां हो। रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम धारा 11 के अनुसार यात्री एवं उसकी सपंत्ति की रक्षा की जिम्मेदारी रेल मंत्रालय की आरपीएफ की है। यू एस झा ने कहा कि रेलवे की 65 हजार किमी लंबी रेलवे की जाल की सुरक्षा में महज 60-65 हजार जवान तैनात हैं। यानि एक हजार किमी लंबी रेल नेटवर्क की सुरक्षा के लिए एक जवान की तैनाती है। यह रेलवे की सुरक्षा के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ और मजाक है। ऊपर से आरपीएफ के पास इतनी शक्तियां नहीं है कि वह किसी रेल अपराध के खिलाफ और यात्रियों और उनकी संपत्ति के खिलाफ होने वाले अपराधों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई कर सके। एक नजर रेलवे के सुरक्षा इतिहास पर डालते हैं। 1854 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने रेलवे में माल की सुरक्षा व रेल क्षेत्रों में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए कुछ व्यक्तियों के एक संगठन को बनाया जिसे ”पुलिस” कहा जाता था। यह संगठन ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन कार्य करती थी। सन 1861 में "पुलिस एक्ट”  बनाया गया। "ईस्ट इण्डिया कम्पनी” द्वारा बनाई गई पुलिस को इसी पुलिस में तब्दील कर दिया गया। 1861 का पुलिस एक्ट भारत वर्ष के लिए पास किया गया था इसमें बंगाल सरकार भी शामिल थी।


1870 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी व बंगाल सरकार में मतभेद हो जाने के कारण इस ’पुलिस संस्था’ का विभाजन दो भागों में हो गया। गवर्नमेंट पुलिस तथा प्राइवेट पुलिस में बंट गया। गवर्नमेंट पुलिस का कार्य जनता में शांति और व्यवस्था बनाए रखना था जबकि प्राइवेट पुलिस रेल सम्पत्ति व माल की सुरक्षा करती थी। सन 1872 में सरकार द्वारा रेलवे के माल की सुरक्षा के लिए एक कमेटी का गठन किया गया। कमेटी के रिपोर्ट के आधार पर पुलिस बल के कर्तव्यों को दो भागों में बांटा गया। अपराध पर नियन्त्रण करना तथा यार्ड, माल एवं अन्य रेलवे सम्पत्ति की देखभाल करना। इसी समय यह जरूरत महसूस की गई कि रेलवे के पास अपना देख-रेख व निगरानी करने वाला अपना कार्य प्रणाली हो। सन 1881 में सरकार ने एक दूसरी कमेटी नियुक्त की जिसने पूर्ण रूप से रेलवे सम्पत्ति की सुरक्षा का भार” वाच एण्ड वार्ड” को देने की सिफारिश की और रेलवे पुलिस जो इस काम के लिए लगाई गई थी उसको वापस कर दिया गया और 1882 में सरकार ने सभी रेल कम्पनियों को अपने माल की सुरक्षा के लिए ”वाच एण्ड वार्ड” प्रथा लागू करने के लिए सूचित किया।


इस प्रकार ”वाच एण्ड वार्ड” का जन्म हुआ। रेलवे में बढ़ते हुए अपराधों की रोकथाम के लिए ”वाच एण्ड वार्ड” के पुर्नगठन की आवश्यकता को देखते हुए सन् 1953 में रेलवे बोर्ड द्वारा एक सुरक्षा सलाहकार समिति को नियुक्त किया गया। सलाहकार समिति की सलाह पर ”वाच एण्ड वार्ड” संस्था को “रेलवे सिक्योरिटी फोर्स” के रूप में बदल दिया गया। रेलवे सिक्योरिटी फोर्स ने 1954 से 1956 तक कार्य किया। इसी दौरान सन 1955 में रेलवे स्टोर्स (विधि विरूद्ध कब्जा) अधिनियम 1955 पास किया गया, जिसमें सिक्योरिटी फोर्स को कुछ अधिकार दिये गये, परन्तु अधिकार कम होने के कारण रेलवे में होने वाले अपराधों पर पूर्णतया अंकुश नहीं लगाया जा सका। उपरोक्त कमेटी की सलाह पर 13 जनवरी सन् 1956 को रेलवे सिक्योरिटी फोर्स का दूसरा नाम ”रेलवे सुरक्षा बल” रखा गया।

29 अगस्त 1957 में “रेल सुरक्षा बल अधिनियम” संसद द्वारा पास किया गया जो 10 सितम्बर 1959 को लागू हुआ, तब से रेल सुरक्षा बल का वैधानिक रूप से गठन हुआ। 10 सितम्बर1959 को ही “रेलवे सुरक्षा बल नियम 1959“ भी लागू हुआ। देश की सीमा से लगे स्थानों तक रेलगाड़ियों को सुरक्षित पहुंचाने व लाने के लिए क्षेत्रीय रेलों से ’रेल सुरक्षा बल’ से अधिकारियों तथा जवानों को इकट्ठा करके एक नये बल "रेलवे सुरक्षा विशेष बल” का गठन किया गया। इसका नाम सन् 1965 में रेल सुरक्षा विशेष बल रखा गया। वर्तमान में इसकी 12 बटालियनें हैं। इसका एक महानिरीक्षक होता है जो महानिदेशक/रे.सु.ब. के अधीन होता है। रेलवे सुरक्षा विशेष बल का मुख्य कार्य लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव के दौरान बंदोबस्त ड्यूटी, मेला ड्यूटी, आतंकवाद व नक्सलवाद जैसे प्रभावित रेल क्षेत्रों में यात्रियों की सुरक्षा हेतु गाड़ी अनुरक्षण ड्यूटी, रेलवे सम्पत्ति की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में पेट्रोलिंग ड्यूटी आदि को करना पड़ता है। जो कि रेलवे सुरक्षा विशेष बल द्वारा अपनी विशेष जवाबदेही के साथ अपनी कर्तव्यों को बड़ी सतर्कता के साथ सम्पन्न किया जाता है।

देश की अर्थव्यवस्था में रेलवे का बड़ा ही योगदान रहा यही वजह रही की माल की ढुलाई के लिए अंग्रेजों ने रेलवे की सहायता ली पर समय के साथ साथ रेलवे सम्पत्तियों की चोरी और रेलवे यात्रियों की सुरक्षा हेतु एक सुरक्षा बल की स्थापना की जरूरत महसूस की गई फल स्वरूप इसकी स्थापना 20 सितंबर 1985 में एक कानून बना कर की गई। आरपीएफ की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन के प्रधान सचिव उमाशंकर झा ने कहा कि जब दुनिया की सारी रेलवे के पास खुद की सुरक्षा तंत्र है जिसमें किसी बाहरी राजकीय पुलिस की कोई भूमिका और घुसपैठ नहीं है तो दुनिया की चौथी सबसे बड़ी भारतीय रेलवे में ऐसा क्यों है?  यहां तक पाकिस्तान और चीनी रेलवे के पास भी अपनी खुद की स्वतंत्र संवैधानिक सुरक्षा बल और तंत्र है। उन्होंने कहा जब तक ऐसा नहीं होगा, जीआरपी जैसी राज्यों की राजकीय पुलिस को जबरन रेलवे में घुसेड़ा जाएगा तो यात्रियों और उनकी संपत्तियों की पूरी सुरक्षा और उसकी क्षति पूर्ति नहीं की जा सकती है।

अगली स्टोरी जल्द आ रही है –>  रेलवे को जीआरपी की लूट-घसोट की चंगुल से मुक्त किया जाए – यू एस झा, प्रधान सचिव, ऑल इंडिया आरपीएफ एसोसिएशन


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