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प्रणब मुखर्जी: भारतीय इतिहास और राजनीति के अजातशत्रु…!

मेजर जनरल जे.के.एस.परिहार (सेवा निवृत) के कलम से

पूर्व अपर महानिदेशक,सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा

पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी 31 अगस्त 2020 को अप्राहन 4.30 बजे महा प्रयाण पर प्रस्थित हो गए.भारत के तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने 25 जुलाई 2012 से 25 जुलाई 2017 तक राष्ट्र की सेवा की. उनका निधन सही अर्थों में सम्पूर्ण  राष्ट्र के लिए एक अपूर्णीय क्षति है. श्री प्रणब मुखर्जी का देश के प्रति समर्पण और निस्वार्थ सेवा तथा संवैधानिक एवं प्रजातांत्रिक मर्यादा और परंपराओं के प्रति  अनुराग एवं निष्ठा  वास्तव में किसी भी कल्पना से परे रही है . सही अर्थों में श्री प्रणब मुखर्जी भारतीय संसदीय प्रणाली में विगत पाँच दशकों में सबसे ऊंचे व्यक्तित्व और जीवित किंवदंती में से एक हैं , जिनके व्यक्तित्व को भारतीय इतिहास , संसदीय प्रणाली और आधी सदी से अधिक की राजनीति के अविभाज्य विश्वकोश एवं प्रकाण्ड ज्ञाता, सबसे सुसंगत और विद्वान सांसद के रूप में हमेशा याद किया जाएगा .


उन्हे 1969 के बाद से देश में लगभग सभी केंद्रीय सरकारों में प्रत्येक कठिन परिस्थितियों  में एक सबसे प्रभावी संकट मोचक के रूप में साथियों और आलोचकों द्वारा  हमेशा सम्मान के साथ माना गया है. राष्ट्रपति के रूप मेँ उन्होने प्रजातन्त्र के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों का हमेशा संपादन करते हुए प्रजातंत्र को एक ऐसी दिशा प्रदान की है जिसमें किस प्रकार राष्ट्र हित और संसदीय मर्यादा का पालन वैचारिक रूप से सत्ता और प्रतिपक्ष के दो विपरीत ध्रुवों मेँ सामंजस्य  स्थापित किया जा सकता है और संविधान के अनुरूप सौहाद्र्य पूर्ण वातावरण निर्मित कर राष्ट्रपति और केंद्रीय मंत्रिमण्डल एक साथ राष्ट्र निर्माण मेँ सतत योगदान दे सकते हैं. उनका जन्म 11 दिसंबर 1935 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसिडेंसी के  किरनाहर शहर के निकट स्थित मिराती गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के यहाँ हुआ था. यह गांव वर्तमान मेँ  पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले का हिस्सा है .उनके पिता ने 1920 से कांग्रेस पार्टी में सक्रिय होने के साथ  ही देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया था . जिन्होंने ब्रिटिश शासन की खिलाफत के परिणामस्वरूप 10 वर्षो से अधिक जेल की सजा भी काटी थी.उन्होंने बाद में कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में 1952 से 1964 के बीच पश्चिम बंगाल की विधान सभा के सदस्य के रूप में कार्य किया .प्रणब मुखर्जी की चार बहनें अन्नपूर्णा बनर्जी, कृष्णा मुखर्जी, झरना और स्वागाता दास मुखर्जी हैं . उनके बड़े भाई पिजेश मुखर्जी का निधन 20 अक्टूबर 2017 को हो गया था. प्रणब मुखर्जी का विवाह  13 जुलाई 1957 को सुरवा मुखर्जी  से हुआ था. सुरवा  मुखर्जी जब 10 साल की थीं तब उनका परिवार पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के नरैल से कोलकाता आ गया था . श्री प्रणब मुखर्जी  अपने दो पुत्रों अभिजीत मुखर्जी और इंद्रजीत मुखर्जी और एक बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी को अपनी विरासत सौंप देव लोक प्रस्थित हो गए. दुर्भाग्यवश श्रीमती सुरवा मुखर्जी का निधन  हृदयघात के कारण 18 अगस्त, 2015 को 74 वर्ष की उम्र में हो गया था .

प्रणब मुखर्जी की प्रारम्भिक शिक्षा पास के किरनाहर के शिबचंद्र हाई स्कूल में हुई . स्कूल जाने के लिए उन्हे मीलों पैदल चलना पड़ता  था ,साथ ही  मानसून के दौरान बहती नदी को तैर कर  पार करना पड़ता था . लेकिन उन्होने  हठपूर्वक अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाया. बाल सुलभ प्रणब के लिए, १९४७ में भारत की स्वतंत्रता का मतलब एक ऐसा सपना था जिसमें  नदी के पार एक फुटब्रिज  बन जाए और  सभी को बेहतर भोजन की व्यवस्था संभव हो सके. तत्पश्चात उन्होने बीरभूम के सूरी विद्यासागर कॉलेज में पढ़ाई की . उन्होंने पुलिया यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस और हिस्ट्री में एम. ए.  के साथ-साथ एल.एल.बी. की उपाधि हांसिल की.


उन्होंने अपने करियर की शुरुआत उप महालेखाकार (पोस्ट एंड टेलीग्राफ) के कार्यालय में अपर डिवीजन क्लर्क के रूप में की थी और इसके बाद विद्यानागर कॉलेज कोलकाता मेँ राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर के रूप में शिक्षण कार्य  किया. लेकिन उन्होंने शिक्षण क्षेत्र से बदलाव करने का फैसला किया और एक पत्रकार के रूप में देशर डाक (मातृभूमि की कॉल) के लिए भी काम किया .अंततः वह 1969 में राजनीति में प्रवेश किया और मिदनापोर में निर्दलीय प्रत्याशी वीके कृष्ण मेनन के चुनाव प्रचार के प्रभारी के रूप में कामयाब रहे . भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें कांग्रेस में शामिल होने की पेशकश की जिसे उन्होने अस्वीकार नहीं किया . श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1969 में उन्हें राज्यसभा के सदस्य के रूप में राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा में शामिल किया. तत्पश्चात 1975, 1981, 1993 और 1999 में भी वह राज्यसभा के लिए चुने गए.वह 1973 में औद्योगिक विकास मंत्री के रूप में केंद्रीय मंत्री बने. बाद में उन्होंने भारत के राष्ट्रपति का पद संभालने से पहले शिपिंग और परिवहन, राजस्व और बैंकिंग, वाणिज्य, आपूर्ति, इस्पात और खान, रक्षा, विदेश और वित्त (दो बार) सहित विभिन्न विभागों में मंत्री के रूप में कार्य किया था ।


उन्होंने 2012 में देश का सर्वोच्च पद संभालने से पहले वर्ष 1991 से 1996 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ-साथ  1980  से 85 राज्य सभा और 2004 से 2012 तक लोकसभा के नेता की जिम्मेदारियां भी संभाली . कांग्रेस में उनकी भूमिका सभी पहलू में समान रूप से महत्वपूर्ण और कार्यकारी थी . उन्होंने 1984, 1991, 1996 और 1998 में संसद के राष्ट्रीय चुनाव कराने के लिए अखिल भारतीय काँग्रेस समिति की अभियान समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली.

किसी भी दुर्गम परिस्थिति में सभी बाधाओं से बाहर आने,यथावत और अति शीघ्र प्रबंधन सबसे कम समय के भीतर सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करने की क्षमता कुछ बिरले व्यक्तियों को ही प्राप्त होती है. संसदीय बहसों और कार्यवाहियों पर उनकी अमिट छाप भारतीय इतिहास, संस्कृति और आदर्शवाद के लिए सबसे समृद्ध श्रद्धांजलि और भावी पीढ़ियों के अध्ययन के लायक अनमोल खजाना है. श्री प्रणब मुखर्जी उनकी दूरदृष्टि , असाधारण मानवीय गुणों के लिये भी हमेशा हमेशा याद किए जाएंगे. उनके इन्ही गुणों की वजह से आधुनिक भारत के अजात शत्रु के रूप में याद किया जाएगा जो पार्टी लाइन के पार या राजनीतिक विचारधारा के बावजूद प्रत्येक दल पक्ष ,विपक्ष और हर एक भारतवासी द्वारा सम्मानित और स्वीकार किए गए. निसंदेह राजनेताओं और सांसदों की वर्तमान पीढ़ी उनके ज्ञान, कौशल से प्रत्यक्ष सीखने के लिए बहुत ही भाग्यशाली है.


श्री प्रणब मुखर्जी को 08 अगस्त 2019 को भारत रत्न से सम्मानित किया गया जो भारतीय प्रजातंत्र की श्रेष्ठता का अभूतपूर्व और ज्वलंत उदाहरण है जिसके अनुरूप वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उनकी राजनीतिक विचारधारा और अन्य कारकों पर ध्यान दिए बिना उनकी राष्ट्र के प्रति उत्त्कृष्ठ सेवाओं का सम्मान करते हुए सर्वोच्चित एवं अति उत्तम चयन किया है.इससे पूर्व श्री प्रणब मुखर्जी को 2008 में पदम विभूषण से सम्मानित किया गया था.

श्री प्रणब मुखर्जी को शृद्धा सुमन करते हुए कुछ स्वरचित पक्तियाँ समर्पित हैं:

जज्बातों से लबालब, अरमानों की कश्ती, संघर्ष का भिश्ती,
जुझारू और संयम की छतरी
एक  खुली किताब जिसके हर पन्ने की हर इबारत में
गुंथी आधुनिक भारत की कही अनकही दास्तां
दस का दम, करोड़ों की आवाज, दृढ़ संकल्प समेटे नव दुर्गा के नव रुप  हैं यह  प्रणब.
पार्थ भी, सारथी भी, चक्रधर भी, भीष्म भी,
प्रियदर्शनी और मनमोहन के संकट मोचक नीलकंठ एवम् कौटिल्य भी  कर,
कमल, तीर, तराजू  गज, ध्वज, चन्द्र और सूर्य  जड़ित
रथ गणतंत्र के द्विज चक्रों पक्ष   और विपक्ष के मध्य अक्ष दण्ड  धुरी,
शेषनाग से संजीवन तक  दंश दहल हर रूप में गणतंत्र के  रक्षक.
राज धर्म, राज दंड से गुंथें अक्षित युग्म , न्याय
संविधान और  सत्य के ध्वज   वाहक, दिव्य दृष्टि रायसीनाधीश प्रणब दा... शत शत नमन


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