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भाप इंजन की रेलगाड़ी एक बार फिर दौड़ेगी पटरी पर!

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

१५ जुलाई २०१८

नई दिल्ली

भाप इंजनों के इतिहास को जीवंत बनाए रखने के लिए और इसके महत्व को समझते हुए तथा भावी पीढ़ी को भाप इंजनों के साथ स्वंय को जोड़ सकने के उद्देष्य से भारतीय रेल संग्रहालय के तत्कालीन निदेषक एवं वर्तमान में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष, अष्विनी लोहानी ने 1997 में फेयरी क्वीन को पुनःशुरु किया था, ऐसा कार्य जिसे किसी भी मानक द्वारा कगार से वापस लाया गया एक स्मारक माना जाता है। भाप इंजनों की बहाली के उनके एकल प्रयास को लोको गेज के पुनर्जन्म के तौर पर देखा जा रहा है जिसमें उत्तर रेलवे के रेवाड़ी स्थित भाप लोको शेड में वर्तमान में मौजूद कई लोको सम्मिलित हैं।


तथापि, इन सभी रोमांचक समयों के दौरान, इन सभी बहाली के प्रयासों और अद्भुद कार्यों में, डब्ल्यूजी श्रेणी माल ढोने का ब्रॉड गेज लोकोमोटिव गायब था क्योंकि नब्बे के दषक के आरंभ और मध्य में उन्हें कबाड़ में बदलने एवं नष्ट करने के लिए जल्दी में चलाए अभियान के दौरान कुछेक ही बचे रह गए थे। ऐसे परिदृष्य में, रेलवे बोर्ड की विरासत और भाप विंग द्वारा किसी भी डब्ल्यूजी श्रेणी लोकोमोटिव की पहचान करने एवं खोजने के प्रयास किए गए जिन्हें संभवतः बहाली के लिए किया जा सकता था। चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स द्वारा 1955 में निर्मित डब्ल्यूजी 10253, जो भुसावल, मध्य रेलवे में पेडस्टल पर स्थित था, की पहचान की गई तथा तब उसे रास्ते पर लाने के दुष्कर कार्य को आरंभ किया गया ताकि मरम्मत के लिए उसे उत्तर रेलवे रेवाड़ी स्टीम वापस लाया जा सके।

अश्विनी लोहानी, अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड ने इस लोकोमोटिव को कुछ माह में पहले जैसा तथा अपनी भाप पर कार्यशील स्थिति में बनाने के लिए उत्तर रेलवे को निर्देश दिए।
अरुण अरोड़ा, प्रमुख चीफ मेकेनिकल इंजीनियर, उत्तर रेलवे ने जानकारी दी कि डब्ल्यूजी 10253 को पिछली बार 1992 में सेवारत देखा गया था तथा लगभग 26 सालों के बाद कुछ ही महीनों में इसके फायरबॉक्स में दोबारा आग जलेगी। 10 सितम्बर, 2017 को भुसावल में उत्तर रेलवे की लोकोमोटिव का अध्ययन और सर्वेक्षण करने वाली विषेषज्ञ टीम ने पुनर्स्थापना का कार्य आरंभ किया।


जॉर्ज स्टीफेन्सन के भाप लोकोमोटिव ने 200 साल पूर्व मानव जाति की जीवन शैली को सदैव के लिए बदल दिया था। जब स्टीम इंजनों के द्वारा आवागमन सुदृढ़ हुआ तथा इसे अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पडा। मानव जाति के लिए भाप कर्षण 1853 में भारत आया तथा उसी साल 16 अप्रैल को इसे भारत वर्ष में बॉम्बे से ठाणे के बीच चलने वाली पहली रेलगाड़ी में उपयोग किया गया।


1960 में भारतीय रेल में भाप कर्षण अपने चरम पर रहा जब चपटी नाक वाले ऐरो-डायनेमिक डब्ल्यूपी और बड़े पैमाने पर डब्ल्यूजी ने भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक की दूरी तय करते हुए गति और विस्तार से लोगों को जोडा जिसकी कल्पना किसी ने पहले नहीं की। तथापि, विद्युत कर्षण की शुरूआत तथा बाद में त्वरित डीजल के आरंभ के साथ, रेलवे में भाप रेलगाड़ियों के शानदार दिन समाप्त हो गए थे तथा धीरे-धीरे इन भाप सुंदरियों को जंक यार्ड में भेज दिया गया और कुछ भाग्यषाली सुंदरियों ने स्वयं को अपनी मूलाकृति की एक छाया प्रति के तौर पर रेलवे कार्यालयों के सामने एक पेडस्टल पर पाया।

बहुत सावधानीपूर्वक योजना बनाने के पश्चात, इसे मेनलाइन पर लाने का कार्य 11 मई, 2018 को आरंभ किया गया ताकि इसे दोबारा रेल की पटरियांे पर लाया जा सके जिसके लिए अंडरगियर, मूविंग कल-पुर्जों, जिनमें सस्पेंषन, बेयरिंग तथा पहिए षामिल हैं, को सर्विस योग्य बनाया जाना था। श्री अरुण अरोड़ा ने यह जानकारी भी दी कि पेडस्टल से मेनलाइन ट्रैक पर इसका परिवहन इसके एक सौ टन से अधिक भार के कारण बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य था जिसे सफलतापूर्वक पूरा किया गया। एक हजार से अधिक किलोमीटर की यात्रा करने के बाद लोको संख्या 10253 षीघ्र ही दिल्ली पहुंचने वाला है और इसके लोको षेड, रेवाड़ी में अगले सप्ताह आगमन पर रस्मों रिवाज के साथ इसका स्वागत किया जाएगा।


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