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आजाद भारत के 1.84 करोड़ लोग गुलाम, और 12 करोड़ बेरोजगार

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़

नई दिल्ली

२० जुलाई २०१८

दुनिया भर में चार करोड़ गुलामों में से भारत में इसकी संख्या 1.84 करोड़ होना वाकई शर्मनाक आकड़ा है। अगर इस संख्या के कई व्यक्तिगत कारण होने का उल्लेख कर हम धैर्य धारण कर ले तो दूसरे चौकाने वाले आकड़े ऐसे है जो भारत को विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बनने में रोकने में सबसे बड़ा रोड़ा है। हम बाॅत कर रहे सुरसा जैसा मुंह फैलाती बेरोजगारी के आकड़ों की यह आकड़ा अब 12 करोड़ की संख्या को पार कर रहा है। पढ़े लिखे और तकनीकि शिक्षा पाए बेरोजगारों की संख्या में होता इजाफा देश की युवा शक्ति को नशे के साथ मानसिक रूप से बीमार कर रहा है।


अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और वॉक फ्री फाउंडेशन ने इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ माइग्रेशन (आईओएम) के साथ मिलकर एक स्टडी की है जिसके मुताबिक दुनिया में 2.5 करोड़ लोग बेगारी करने के लिए मजबूर हैं तो वहीं 1.5 करोड़ लोग जबरन शादियों में जीवन बिता रहे हैं इंडेक्स जारी करने वाले संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग गुलाम है। ये आंकड़े 2016 के हैं। जबकि 2018 में इस संख्या के बढ़ने का पूरा अनुमान लगाया जा रहा है। भारत में सबसे ज्यादा गुलाम हैं। 130 करोड़ की आबादी वाले देश में करीब 1.84 करोड़ लोग गुलाम हैं।देश को आजाद हुए सात दशक बीत गए हैं लेकिन आज भी देश की 1.3 अरब जनसंख्या में कुल 1.84 करोड़ लोग गुलाम हैं। यह आंकड़े हैं वर्ष 2016 के जिन्हें मानवाधिकार समूह वाक फ्री फाउंडेशन ने ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स-2018 नामक रिपोर्ट में बृहस्पतिवार को प्रकाशित किया है। वाक फ्री फाउंडेशन और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक 2016 तक दुनिया भर में चार करोड़ से अधिक लोग गुलाम हैं। भारत इनमें शीर्ष पर है। जबकि उत्तर कोरिया में हर दसवें व्यक्ति को आधुनिक युग का गुलाम बताया गया है।

सबसे ज्यादा गुलामों वाले शीर्ष पांच देशों में भारत के बाद चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और उजबेकिस्तान शामिल हैं। फाउंडेशन ने पूर्व में कहा था कि शीर्ष पांच देशों के भीतर दुनिया के कुल 58 फीसदी लोग गुलामी के वातावरण में अपना जीवन बिता रहे हैं। इंडेक्स के मुताबिक उत्तर कोरिया, अफ्रीकी देश इरिट्रिया और बुरुंडी में वहां की जनसंख्या की दर के हिसाब से गुलाम लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। चूंकि भारत की आबादी के मुकाबले उत्तर कोरिया, इरिट्रिया व बुरुंडी की आबादी बेहद कम है इसलिए यहां आनुपातिक रूप से गुलामी का प्रतिशत भी भारत से काफी ज्यादा है।


आंकड़े एकत्रित करने वाली टीम के प्रमुख फियोना डेविड ने कहा कि उत्तर कोरिया, इरिट्रिया और बुरुंडी में सरकार प्रायोजित बंधुआ मजदूरी कायम है, जो हैरत में डालती है। सबसे ज्यादा गुलामी की दर वाले देशों में केंद्रीय अफ्रीकी रिपब्लिक, अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान और पाकिस्तान शामिल हैं। इस रिपोर्ट में जी-20 के सदस्य देशों पर भी उंगली उठाई गई है। इन देशों में हर साल करीब 354 अरब डॉलर का ऐसा उत्पादन होता है जिसमें बंधुआ मजदूरी का खतरा रहता है। इनमें कंप्यूटर, मोबाइल फोन, मछली और इमारती लकड़ी जैसे काम शामिल हैं। अब बात करे सुरसा के मुंह की भाती मुंह फैलाती बेरोजगारी की तो वह भी चैकने वाले आकड़े दे रही है। भारत में 12 करोड़ लोग बेरोजगार बताया जा रहे है। यह आकड़ा दो वर्ष पुराना है। नोटबंदी के सिर्फ भारत सरकार के भविष्य निधि खातों को खगाल लिया जाए तो यह संख्या और बढ़ जाएगी। भारत में खासकर युवा तबके में बढ़ती बेरोजगारी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। देश की आबादी के लगभग 11 फीसदी यानि 12 करोड़ लोगों को नौकरियों की तलाश है।सबसे चिंता की बात यह है कि इनमें पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद ही सबसे ज्यादा है। बेरोजगारों में 25 फीसदी 20 से 24 आयुवर्ग के हैं, जबकि 25 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद 17 फीसदी है। 20 साल से ज्यादा उम्र के 14.30 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ता बेरोजगारी का यह आंकड़ा सरकार के लिए गहरी चिंता का विषय है।
वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर केंद्र सरकार की ओर से हाल में जारी इन आंकड़ों में महिला बेरोजगारी का पहलू भी सामने आया है। नौकरी की तलाश करने वालों में लगभग आधी महिलाएं शामिल हैं। इससे यह मिथक भी टूटा है कि महिलाएं नौकरी की बजाय घरेलू कामकाज को ज्यादा तरजीह देती हैं। बेरोजगारों में 10वीं या 12वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद 15 फीसदी है। यह तादाद लगभग 2.70 करोड़ है। तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले 25-30 फीसदी युवा भी बेरोजागारों की कतार में हैं। इससे साफ है कि देश के तकनीकी संस्थानों और उद्योग जगत में और बेहतर तालमेल जरूरी है। इन आंकड़ों से साफ है कि पढ़े-लिखे युवा छोटी-मोटी नौकरियां करने की बजाय बेहतर मौके की तलाश करते रहते हैं। बेरोजगार युवाओं में लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो साल में छह महीने या उससे कम कोई छोटा-मोटा काम करते हैं। लेकिन उनको स्थायी नौकरी की तलाश है। कुल बेरोजगारों में ऐसे लोगों की तादाद लगभग 34 फीसदी यानि 1.19 करोड़ है। वर्ष 2001 से 2011 के दौरान 15 से 24 वर्ष के युवाओं की आबादी में दोगुनी से ज्यादा वृद्धि हुई है। लेकिन दूसरी ओर उनमें बेरोजगारी की दर 17.6 फीसदी से बढ़ कर 25ं-30फीसदी तक पहुंच गई है। वर्ष 2001 में जहां 3.35 करोड़ युवा बेरोजगार थे वहीं 2011 में यह तादाद 4.69 करोड़ पहुंच गई। वर्ष 2001 में युवाओं की आबादी एक करोड़ थी जो 2011 में 2.32 करोड़ हो गई थी यानि इसमें दोगुना से ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई। इसके मुकाबले इस दौरान देश में कुल आबादी में 17.71 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई। इन आंकड़ों से साफ है कि युवाओं की तादाद जहां तेजी से बढ़ रही है वहीं उनके लिए उस अनुपात में नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं।


भारत में गुलामों और बेराजगारी के आकड़े एक सुस्पष्ट बहुमत वाली सरकार के लिए चिन्ताजनक होने चाहिए। बेरोजगार युवाओं की तेजी से बढ़ती तादाद देश के लिए खतरे की घंटी है और नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार को तुरंत इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए। इस देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। लगभग 45 फीसदी युवा बेरोजगार है। पेट भरने के लिए यहां की लड़कियां मजबूरन देहव्यापार से जुड़ रही हैं। इसके चलते देश में सेक्स पर्यटन बढ़ता जा रहा है। अपराधों में बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है। युवा मानसिक बीमारों में इजाफा भी हो रहा है जो एक बेहतर राष्ट्र के लिए दुर्भाग्यजनक स्थिति है। साथ में समाचार एजेंसी जीएनएस। साभार।


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