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ज्ञानवापी मामले में सर्वोच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, मामले को वाराणसी जिला कोर्ट को सौंपा

आकाश श्रीवास्तव

थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़ नेटवर्क

नई दिल्ली, 20 मई 2022

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जे चंद्रचूड़ की अगुवाई में शुक्रवार को तीन जजों की बेंच ने ज्ञानवापी मामले में सुनवाई की। और ज्ञानवापी के पूरे मामले को वनारस कोर्ट के जिला न्यायाधीश को सौंप दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा जिला न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई करने के लिए पूरी तरह से सक्षम हैं हम उनके विवेक और वुद्धि पर कोई सवाल नहीं उठा सकते है। इस पहले  तीन न्यायाधीश की पीठ ने कहा कि वह अभी तीन सुझावों पर कुछ कर सकती है। पहला, वह कह सकती है कि ऑर्डर 7 रूल 11 के तहत फाइल की गई याचिका पर ट्रायल कोर्ट फैसला दे। दूसरा, उसने अंतरिम आदेश दिया है जिसे मामले के निस्‍तारित या फैसला आ जाने तक जारी रखा जा सकता है। तीसरी चीज जो बेंच कर सकती है वह यह है कि मामले की पेचदगी और संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी सुनवाई जिला जज करें। ऐसा करते हुए बेंच ट्रायल जज पर किसी तरह का आरोप या दोष नहीं मढ़ रही है। बस, इतनी सी बात है कि कोई ज्‍यादा अनुभवी इस मामले को सुने। इससे सभी पार्टियों के हितों की सुरक्षा की जा सकेगी।

न्यायाधीश जे चंद्रचूड़ ने कहा कि हम न्यायिक अधिकारियों पर कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं। हम तीनों (जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस पीएस नरसिम्हा) ने इस बारे में काफी लंबी चर्चा की कि सबसे अच्छा तरीका क्या होना चाहिए जिसे अपनाया जा सकता है। मस्जिद समिति की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि इन सभी में गंभीर शरारत की आशंका है। इस पर शुरू में ही अंकुश लगाना होगा। आयोग की नियुक्ति से लेकर सभी आदेश अवैध हैं। उन्हें शून्य घोषित किया जाना चाहिए।इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आदेश 7 नियम 11 को आपके अनुसार पहले लेना चाहिए था और ऐसा नहीं किया गया। अब हम जो करने का इरादा रखते हैं वह यह तय करना है कि क्या कमीशन का आदेश अधिकार क्षेत्र में था या नहीं, हमें योग्यता में जाना होगा।
अहमदी ने कहा कि हमारी एसएलपी आयोग की नियुक्ति के खिलाफ है। इस प्रकार की शरारत को रोकने के लिए ही 1991 का अधिनियम बनाया गया था। कहानी बनाने के लिए आयोग की रिपोर्ट को चुनिंदा तरीके से लीक किया गया है। यह कुछ ऐसा है जिसमें आपको हस्तक्षेप करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि जिला जज का आदेश आ जाने तक उसका 17 मई को जारी अंतरिम आदेश बना रहेगा। इसमें उसने कहा था कि शिवलिंग वाली जगह को संरक्षित किया जाएगा। साथ ही मुस्लिमों को मस्जिद परिसर में नमाज की इजाजत रहेगी। उसके बाद आठ सप्ताह के लिए पीड़ित पक्षों को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की अनुमति दी जाएगी।

इससे पहले ट्रायल कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन एक वादी की ओर से पेश हुए हैं। उन्‍होंने बेंच को बताया कि उनके अनुसार, जहां तक आदेश 7 नियम 11 के आवेदन पर निर्णय लेने की बात है, तो संपत्ति के धार्मिक स्वरूप को देखना होगा। इसके लिए आयोग की रिपोर्ट देखनी होगी। वैद्यनाथन ने दलील दी कि ऐसे में आयोग की रिपोर्ट देखने के उस सीमित उद्देश्य के लिए ट्रायल कोर्ट को मामले को देखने दिया जाए। इस पर न्यायाधीश ने जे चंद्रचूड़ ने कहा कि हमें आपकी बात समझ में आ गई। हम इसे जिला जज पर छोड़ देंगे, जो 20-25 साल का अनुभव रखते हैं। वे जानते हैं कि इसे कैसे संभालना है।








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