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रेल मंत्री का ध्यान सिर्फ वंदेभारत तक
रेल मंत्रालय का पूरा जोर वंदेभारत जैसी कुछ रेलगाड़ियों को चमकाने तक अब सीमित रह गया है। वहीं आम रेलगाड़ियों जिसमें देश का आम नागरिक रोजाना करोंडों की संख्या में यात्रा करता है उसकी हालत दिनों दिन खराब होती जा रही है।  सामान्य रेलगाड़ियों में मिलने वाली खाद्य सामग्री दिनों दिन घटिया होती जा रही है। चाहे पीने का पानी हो, खाना हो या फिर चाय हो। करोड़ों की संख्या में रोज सफर करने वाला आम इंशान रेलवे द्वारा इतना मजबूर कर दिया गया है कि उसे जो भी रेल स्टेशनों अथवा सामान्य रेल गाडियों में सफर के दौरान  दे दिया जाता है उसे वही खरीदने और खाने पीने के लिए मजबूर होना पड़ता है। सामान्य रेल गाड़ियों में आम आदमी भेड़ बकरी की तरह सफर करने के लिए मजबूर है। उसे राहत देने के लिए रेलवे के पास कोई फार्मूला नहीं है। सुविधा के नाम पर शुल्क जरूर वसूला जाता है।

कहने की जरूरत नहीं तस्वीर खुद बोलती है।

जब से रेलवे ने रेलवे में निजीकरण को बढ़ावा दिया है देश के गरीब आम यात्रियो की यात्रा और कठिन होती जा रही है। रेलगाड़ियों में चाय के नाम पर गरम रंगीन पानी परोसा जा रहा है, रेलवे में लोकल और घटिया दूषित पानी की बोतलें दी जा रही है, यात्रा के दौरान घटिया सड़ा गला, कच्चा खाना दिया जा रहा है। डिप चाय रेलगाड़ियों से खत्म हो चुकी है। शिकायत करने पर रफा दफा कर दिया जाता है। 60-70 रूपए वाली थाली 120 से लेकर 150 रूपए में दी जा रही है। पानी की बोतलें से लेकर अन्य खाने पीने की चीजें भी एमआरपी से अधिक दाम पर बेची जा रही हैं। यानि खाने पीने की चीजों से गुणवत्ता गायब हो चुकी है। मजे की बात है शिकायत करें तो किससे करें सुनवाई के नाम पर लीपापोती होती है। संबंधित और जिम्मेदार रेल अधिकारी फोन तक नहीं उठाते। वाट्सअप करने पर न तो मैसेज देखते हैं और न तो कोई जवाब देते हैं। आम यात्रियों का कहना है कि जो कुछ भी हो रहा है उसमें रेल अधिकारियों की बड़ी मिलीभगत और बहुत बड़ा भ्रष्टाचार इसमें शामिल है।

10 दिन के अंदर हमने रेलवे के अलग अलग जोनों में लगभग 35 सौ किमी की यात्रा की। जिसमें उत्तर रेलवे, मध्य रेलवे, पश्चिम रेलवे, उत्तर पूर्व रेलवे, उत्तर पश्चिम रेलवे आदि जोनों से होकर विभिन्न रेल खंड़ों से होकर गुजरा, लगभग सभी स्टेशनों और विभिन्न रेलगाड़ियों का यही हाल देखने को मिला। गर्मी के साथ ही रेलवे स्टेशनों पर पानी की व्यवस्था नदारत है पहले स्टेशनों पर ठंडा पानी मिल जाया करता था लेकिन अब उस व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है। यही नहीं रेलवे पूरे देश के स्टेशनों पर स्वच्छ पानी बाजार भाव से कम दाम में उपलब्ध कराने की बात कही थी। लेकिन देश के ज्यादातर रेलवे स्टेशनों पर से स्वच्छ पानी का स्टाल गायब है, यदि है भी तो उसमें पानी उपलब्ध नहीं है, ताला लगा हुआ है। ठंडाई के नाम पर गुणवत्ताहीन बगैर ब्रांड की लोकल घटिया आइसक्रीम व लस्सी आदि बेची जा रही है। 

रेलवे के लगभग सभी जोनों में खाद्य सामग्री बिक्री में रेलवे के नियमों का पालन कागजों में ही हो रहा है। स्टाल से यात्रियों को बिल देना अनिवार्य किया गया है। इसकी काट करते हुए स्टाल संचालक दिन भर में थोड़ी-थोड़ी देर में बिलिंग मशीन से कुछ बिल जारी करते हैं, जिसे रिकार्ड में यात्रियों को देना बताया जाता है जबकि ट्रेन आने पर यात्रियों को बिल नहीं दिया जाता। स्टेशन पर इसकी निगरानी के लिए जिन्हें जिम्मेदारी दी गई है वे भी रजिस्टर में इंट्री करवाकर औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। गर्मी में तपते यात्रियों की मजबूरी का लाभ उठाते हुए दर्जनों वेंडर ट्रेन आने पर कोच में फेरी लगाते हुए खुलेआम गुणवत्ताविहीन सामग्री बेच रहे हैं। आरपीएफ पर भी वेंडरों की रोकथाम की जिम्मेदारी है । इसके बाद भी सामग्री बिक्री नहीं रुकने के चलते सवाल खड़े हो रहे हैं। यानि आरपीएफ और रेल अधिकारियों की सीधी मिलीभगत है कि आम आदमी यदि मरे तो मरे। कहने को तो यह भी है कि रेलवे के स्वास्थ्य विभाग द्वारा इन सामग्री के सैंपल लेकर इनकी लैब में जांच कराने के नियम हैं। इस ओर विभाग का भी ध्यान नहीं है।

स्टेशन की लगभग सभी स्टालों पर रेलवे से स्वीकृत खाद्य सामग्री के अतिरिक्त भी सामग्री बिक रही हैं। ठंडे पेय पदार्थ के नाम पर लोकल लस्सी, छाछ आदि की बिक्री खुलेआम हो रही है। चार-पांच रुपए कीमत की सामग्री 20-25 रुपये में बेचकर यात्रियों का स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। सवाल उठता है कि सिर्फ वंदेभारत चला देने से क्या रेलवे की छवि बदल जाएगी, आखिर आम यात्रियों के लिए बेहतर रेल यात्रा कब उपलब्ध होगी?



आज भी आम रेलगाड़ियों की हालत बद से बदतर है।
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